गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

युगान्तर के पर्व में


युगान्तर के पर्व में
- लीना मेहेंदळे

हम कहते सुनते हैं कि हिंदु धर्म मे चार वेद कहे गये हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्व वेद | चार वर्ण भी कहे गये हैं - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र | चार आश्रम हैं - ब्रह्मचर्य गार्हस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास | इसी प्रकार चार युग भी कहे गये हैं - सत्य युग, त्रेता युग, द्बापर युग और कलि युग | मेरी मान्यता हैं ये सभी संकल्पनाएँ एक दूसरे में गुंथी हुई हैं |

देखा जा सकता हैं कि सत्य युग में समाज की परिकल्पना तो उदित हो चुकी थी लेकिन राजा और राज्य की परिकल्पना अभी दूर थी | आग का आविष्कार हो चुका था, उसी प्रकार भाषा का भी | आँकडों गणित का भी ज्ञान था और वर्णमाला तथा लेखन कला का भी | मनुष्य अपने आविष्कारों से नए नए आयाम छू रहा था | कृषि और पशुपालन दैनंदिन व्यवहार बन चुके थे और कृषि संस्कृति का विस्तार भी हो रहा था | ज्ञान और विज्ञान की साधना हो रही थी |

मनुष्य यद्यपि समाज में रहने लगा था फिर भी गाँव समाज और खेती पर ही पूरी तरह निर्भर नही था | अभी भी वन - जंगल उसे प्रिय थे और वनचर बन कर रहना उसे आता था | ज्ञान साधना के लिये अनगिनत नए आयाम अभी खोजने बाकी थे | जो ज्ञान मिला उसकी सिद्घता, फिर प्रचार, प्रसार और समाज के लिये उपयोगिता - सारे एक सूत्रबद्घ कार्यक्रम थे | तभी वह ज्ञान उपजीविका का साधन बन सकता था |

इसीलिये वनों मे रहकर ही ज्ञानसाधना चलतीं | इसके लिये वनों में गुरूकुल थे | बडें बडे ज्ञानी ऋषि बच्चोंको गुरूकुल में लाकर रखते | उनसे ज्ञान साधना करवाते | उनके भोजन आवास का प्रबन्ध करते थे तो उनसे काम भी करवाते थे | जिस ऋषि के आश्रम मे भारी संख्या में विद्यार्थी हों उन्हें कुलगुरू कहा जाता | इस संबोधन का प्रयोग महाभारत में भी हुआ है |

दूसरी ओर व्यवसाय ज्ञान का प्रसार भी हो रहा था | खेती, पशुसंवर्धन, शस्त्रास्त्रों की खोज निर्माण हो रहे थे | आरोग्यलाभ और परिरक्षा के लिये आयुर्वेद फैल रहा था | द्रुतगामी वाहन ढूँढे जा रहे थे | शंकरजी के लिये नंदी, दुर्गा के लिये सिंह, विष्णु के लिये गरूड, यम के लिये भैंसा, इन्द्र का ऐरावत हाथी, कार्तिकेय के लिये मयूर, गणेश के लिये मूषक, लक्ष्मी का उल्लू और सूर्य का घोडा - ये सारे किस बात का संकेत देते हैं ? इसकी कल्पना तो आज की जा सकती है लेकिन तथ्य समझना मुश्किल ही है | फिर भी वायुवेग से चलने वाला, और ऐसी गति के लिये पृथ्वी से चार अंगुल ऊपर ही ऊपर चलनेवाला इंद्र का रथ था जिसका सारथ्य मातली किया करता था | उससे भी आगे की शताब्दियों में आकाश मार्ग से विचरण करनेवाला विमान पुष्पक कुबेर के पास था जिसे बाद में रावण नें छीन लिया | रामायण की कथा देखें तो इसी विमान से राम लंका से अयोध्या आये और फिर विमान को विभीषण वापस लंका ले गया | इससे कई गुना अधिक प्रभावी क्षमता थी नारद के पास - वे मन के वेग से चलते थे | जिस पल जहाँ चाहा, पहुँच गये | इतना ही नही, आवश्यक हुआ तो वे औरों को भी अपने साथ ले ला सकते थे | एक ऐसे ही प्रसंग में वे एक राजा तथा उसकी विवाह योग्य कन्या रेवती को ब्रह्मदेव के पास ले गए | जब वापस लौटे तो युग बदल गया था, और पृथ्वी पर रेवती के अनुरूप वर भी मिल गया - बलराम |
सारांश में तीव्र गति वाहनों की खोज, खगोल शास्त्र, अंतरिक्ष शास्त्र इत्यादि विषय उस युग में ज्ञात थे | इन भौतिक जगत्‌ की विषय वस्तुओं के साथ साथ जीवन और मृत्यु से संबंधित विचार और चर्चाएँ भी खूब होती थीं और विभिन्न मतों का आदान - प्रदान होता था | जीवन, मृत्यू क्या है ? आत्मा और चैतन्य क्या है ? मरणोपरान्त मनुष्य का क्या होता है यह भी कौतुहल का विषय था | सत्य और अमृतत्व का कहीं कहीं कोई गहरा रिश्ता है लेकिन वह क्या रिश्ता है यह चर्चां बारबार हुई है | मेरी व्यक्तिगत मत है कि इन चर्चाओंको भविष्य के लिये लेखाबद्ध किया गया और हो न हो, यही उपनिषद हैं।
कठोपनिषद में यम नचिकेत संवाद का कुछ हिस्सा मुझे हर बार विस्मित कर देता है | पिता ने कह दिया - जा मैंने तुझे यम को दान में दिया तो नचिकेत उठकर यम के घर पर पहुँचा और चूँकि यम कहीं बाहर गया हुआ था, तो नचिकेत तीन दिन भूखा प्यासा बैठा रहा | यह प्रसंग बताता है की यम कोई पहुँचसें परे व्यक्ति नही थी | आगे भी सावित्री की कथा या कुंती द्वारा यम को पाचारण करके उससे युधिष्ठिर जैसा पुत्र प्राप्त करना इसी बात का संकेत देते है |
यम लौटा तो यम-पत्नी ने कहा - एक ब्राह्मण अपने दवार पर तीन दिन-रात भूखा प्यासा बैठा रहा - पहले उसे कुछ देकर शांत करो वरना उसका कोप हुआ तो अपना बडा नुकसान होगा | यम नचिकेत से तीन वर मॉगने को कहता है | पहले दो वरोंसे नचिकेत अपने पिता का खोया हुआ प्रेम और पृथ्वीके सुख मॉगता है लेकिन तीसरे वरसे वह जानना चाहता है की मृत्यु के बाद क्या होता है | इस ज्ञान से उसे परावृत्त करने के लिये यम उसे स्वर्गसुख और अमरत्व भी देना चाहता है लेकिन नचिकेत अड जाता है | यदि तुम मुझे अमरत्व और स्वर्ग देने की बात करते हो तो इसका अर्थ हुआ की यह ज्ञान उनसे श्रेष्ठ है | इस संवाद से संकेत मिलता है की मरणोपरान्त का अस्तित्व अमरत्व से कुछ अलग है और श्रेष्ठ भी है | इसपर यम प्रसन्न होकर नचिकेत को बताता है कि यज्ञ की अग्नि कैसे सिध्द की जाती है और उस यज्ञ से सत्य की प्राप्ति और फिर उस सत्य से मृत्यु के परे होनेवाले गूढ रहस्यों का ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाता है |
दूसरी कथा है सत्यकाम जाबाली की - जिसमें सत्यकाम के आचरण और सत्यव्रत से प्रसन्न होकर स्वयं अग्नि हंस का रुप धरकर उसके पास आया और उसे चार बार ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया | उसका वर्णन यों है सुन आज मैं तुम्हें सत्य का प्रथम पाद बताता हूँ| फिर एक एक करके सत्यके द्बितीय पाद, तृतीय पाद और चतुर्थ पाद बताये | यहाँ भी सत्य को ही ब्रह्मज्ञान बताया है |
इसी प्रकार त्रिलोकों के पार अंतरिक्ष में जो सात लोक होने की बात की गई है उसमें सबसे श्रेष्ठ और सबसे तेजोमय लोक का नाम सत्यलोक ही है | ईशावास्योपनिषद में इसी ज्ञान के लिये विद्या और पृथ्वीतल के भौतिक ज्ञानोंके लिये अविज्ञा शब्द का प्रयोग करते हुए दोनों को एक सा महत्वपूर्ण बताया है - जानकार व्यक्ति विद्या और अविद्या दोनों को पूरी तरह समझ लेता है, फिर अविद्या की सहायता से मृत्यु को तरकर - उससे पार होकर, अगला प्रवास आरंभ करता है, और उस रास्ते चलते हुए परा विद्या की सहायता से अमृतत्व का प्राशन करता है | इसीसे ईशावास्य में प्रार्थना है सत्यधर्माय दृष्टये और माण्डूक्थोपनिषद की प्रार्थना है - सत्यमेव जयते नानृतम्‌ .
तो ऐसे सत्ययुग में गणितशास्त्र की पढाई काफी प्रगत थी | खासकर कालगणना का शास्त्र | पृथ्वी पर कालगणना अलग थी और ब्रह्मलोक की अलग थी | सीलिये रेवती की कथा में वर्णन है की जब ब्रह्मलोक का एक दिन पूरा होता है तो उतने समय में पृथ्वीपर सैकडों वर्ष निकल जाते है | उनका भी गणित दीर्घतमस्‌ ऋषि के कुछ सूक्तोंमें मिलता है |
वर्णन है कि विविध देवता और असुरों ने कई कई सौ वर्ष तपश्चर्या की | पार्वती ने शंकर को पाने के लिये एक सहस्त्र वर्ष तपस्या की | और भी कईयों ने | अगर ये सारे वर्णन सुसंगत हों तो उनका संबंध निश्चित ही अन्तरिक्ष के इन अलग अलग लोकों से होगा |
काल गणना का एक अति विस्तृत आयाम हमारे ऋषि मुनियों ने दिया है | उनकी गणना मानें तो ब्रह्मदेव की आयु सौ वर्ष की है | लेकिन ब्रह्मा का एक दिन पृथ्वी लोक के एक सहस्त्र महायुगों जितना बडा होता है | उतनी ही बडी ब्रह्मदेव की रात्री भी होती है | एक महायुग में सत्ययुग के 1728 हजार वर्ष, त्रेता के 1296 हजार वर्ष, द्बापर के 864 हजार वर्ष और कली के 432 हजार वर्ष इस प्रकार कुल 4320 हजार वर्ष होते हैं | इस गणित से ब्रह्मदेव की आयु के 50 वर्ष बीत चुके हैं अर्थात्‌ पृथ्वी की आयु भी 8000 करोड वर्ष हो चुकी है |
सत्य युग में ज्ञान के नये आयामों की खोज और विस्तार और उससे समाज उपयोगी पद्घतियाँ विकसित करना ही प्रमुख ध्येय था |
इसके बाद आये त्रेतायुग में राजा और राज्य की परिकल्पना का उदय हुआ | ज्ञान का विस्तार हो ही रहा था | अब उसमें नगर रचना, वास्तुशास्त्र, भवन निर्माण, शिल्प जैसे व्यावहारिकता में उपयोगी शास्त्र जुडने लगे | ज्ञान से सृजन और उससे संपत्ति का रक्षण महत्त्वपूर्ण हुआ | तब शस्त्र निर्माण का महत्त्व बढ गया | इसी काल में धनुर्वेद का उदय हुआ | आग्नेयास्त्र, पर्जन्यास्त्र, वज्र, सुदर्शन चक्र, ब्रह्मास्त्र, महेंद्रास्त्र जैसे शक्तिशाली अस्त्र और शस्त्रों का निर्माण हुआ | समाज की रक्षा करने के लिये और समाज व्यवस्था के लिये राजे - रजवाडों की प्रथा चल पडी | उन्हें सेना रखने की जरूरत पडी | सेना का खर्चा चलाने के लिये कर वसूलने की प्रथा भी चली | खेती योग्य जमीन पर स्वामित्व की प्रथा भी चल पडी | उत्पादन पर भी कर लगा | यह सब कुछ संभालने का जिम्मा क्षत्रियों के कंधों पर पडा |
ज्ञान साधना के लिये ब्राह्मणों का मान-सम्मान और आदर कायम रहा | लेकिन नेतृत्व अब क्षत्रियों के पास गया | महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर ब्राह्मणों की राय ली जाती थी | ब्रह्मदंड का मान अब भी राजदण्ड से अधिक था | लेकिन ब्रह्मदण्ड और राजगुरू दोनों का काम किसी निमित्त ही होता था | रोजमर्रा की व्यवस्था के लिये राजा ही प्रमाण था | एक विश्र्वास फैल गया कि राजा के रूप में स्वयं विष्णु विराजते हैं |
संपत्ति के निर्माण के लिये कई प्रकार के तंत्रज्ञान और उससे जुडे व्यवसायों की आवश्यकता होती है | भवन निर्माण के लिये धातुशास्त्र का अध्ययन चाहिये लेकिन साथ में कुशल लुहार, बढई चाहिये | इसी तरह अन्य कई शास्त्रों की पढाई के साथ कुशल बुनकर, रंगरेज, ग्वाला, जुलाहा, गडेरिया, चमार, शिल्पकार इत्यादि भी चाहिये | आयुर्वेद में भी स्वस्थ वृत्त में वर्णित यम - नियम, संयम, उचित आहार इत्यादि सिद्घान्त पीछे छूट गये और दवाइयाँ बनाने का महत्त्व बढा क्यों कि युद्घ में घायल हुए लोगों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिये वह अधिक जरूरी था | पशुवैद्यक इतना प्रगत हुआ कि सहदेव, नकुल और भीम स्वयं राजपुत्र होते हुए भी क्रमश: गाय, घोडे और हाथियों की अच्छी प्रजातियों के संवर्द्घन में निष्णात थे | रथों का निर्माण, सारथ्य, नौका निर्माण, रास्ते, तालाब और नहर बनाना आदि शास्त्र भी प्रगत थे | कथा के अनुसार भगीरथ ने तो गंगा को ही स्वर्ग से पृथ्वी पर उतार दिया | व्यवहार के दृष्टिकोण से भी जिस तरह से पश्चिम वाहिनी गंगा का विशाल प्रवाह मुड कर गंगा पूर्व वाहिनी हो गई है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि धरण बनाने का शास्त्र भी प्रगत रहा होगा | एक अन्य कथानुसार रामने तो समुद्र में ही पुल बंधवा लिया |
ईंट, सिक्के, आईने, धातु शिल्प इत्यादि नये व्यवसाय उदय होने लगे | सत्ययुग में कृषि शास्त्र तो विस्तृत हो चुका था | द्वापर में आते आते हस्तकला और हस्त - उद्योगों की संख्या ऐसी बढी कि वर्णाश्रम व्यवस्था का उदय हुआ | ज्ञान साधन और ज्ञान प्रचार करे सो ब्राह्मण, राज्य और युद्घ करे सो क्षत्रिय, कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य करे सो वैश्य और हस्त-उद्योग, सेवा तथा देखभाल करे सो शूद्र इस प्रकार वर्ण व्यवस्था बनी | लेकिन यह वर्णभेद जन्म से नही बल्कि गुण और कर्मों से था | भगवद्गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा कि चातुर्वण्यं मया सृष्टं, गुणकर्मविभागश: | और यह सच भी था क्यों कि विष्णुको क्षत्रिय, परंतु उसके पुत्र ब्रह्मदेव को ब्राह्मण कहा गया | शंकर वर्णों से परे है लेकिन उसके पुत्र कार्तिकेय क्षत्रिय तो गणेश ब्राह्मण कहलाये | अश्विनीकुमार तथा धन्वन्तरी के वर्ण की बाबत मैंने कुछ नही पढा है | विश्वामित्र पहले क्षत्रिय थे फिर ब्रह्मर्षि कहलाये | लेकिन इन गिने चुने उदाहरणोंको छोड दें तो अगले सैकडों वर्षों मे ऐसा उदाहरण देखने को नही मिलता जिसमें मनुष्य के जन्मजात वर्ण के अलावा गुणों और कर्मोंके अनुरूप उसका परिचय अन्य वर्णीय किया गया हो | उस काल के साहित्य या अन्य वाड्.मय ऐसा उदाहरण नही दिखाते | क्या हम यह कहें कि इस प्रकार गुणकर्म-आधारित वर्णव्यवस्था समाजधुरिणों का एक दिवास्वप्न मात्र बनकर रह गया |
त्रेता के बाद आये द्बापर युग में राज्य की संकल्पना अपने चरम पर थी | माना जाता है कि महाभारत युद्घ भी द्बापर के अंतिम चरण में घटा है | महाभारत युद्घ में पृथ्वी के प्रायः सभी राजे और क्षत्रिय योद्घा मारे गये | फिर समाज व्यवस्था और नियम-कानून टिकाये रखने के लिये उस जमाने के समाज शास्त्रियों ने क्या किया ? पहले त्रेता युग में भी परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया था | तब, या फिर महाभारत युद्घ के बाद कोई उल्लेखनीय राज्यव्यवस्था होते हुए भी समाजव्यवस्था कैसे टिक पाई यह चर्चा किसी ग्रंथ में नही मिली |
इसके बाद आया कलियुग | इसकें पिछले दो-अढाई हजार वर्षों का इतिहास हमारें सामने है | इस काल में गणराज्यों की कल्पना उदित हुई जिसमें लोगों के एकत्रित सोच विचार से राज्य व्यवस्था चलाने की बात थी | भारत में यह परम्परा 2500 वर्ष पहले चली और फिर खंडित हो गई | लेकिन करीब 500 वर्ष पहले पश्चिमी देशों मे लोकतंत्र की परिकल्पना ने अच्छी तरह जड पकड ली और अब संसार के कई देशों मे यही राज्य यंत्रणा है | जहाँ नही है, उस देशको मानवी विकास की दृष्टि से कम आँका जाता है |

इसका अर्थ हुआ कि त्रेता और द्बापर युग में राजा नामक जो संकल्पना उदित हुई वह कलियुग के इस दौर में कालबाह्य हो रही है |

चौदहवीं सदी से पहले खुष्की के रास्ते पश्चिमी देशों के आक्रमण भारत पर होते रहे | लेकिन चौदहवीं सदि में समुद्री रास्ते भी खुलने लगे और उन रास्तों से व्यापार बढने लगा | सिंदबाद की साहसी समुद्री यात्रा की कथाओं को अरेबियन नाइट्स कथासंग्रह में एक सम्माननीय स्थान प्राप्त था | इस कालमे इंग्लंड, स्पेन, पोर्तुगाल, डेन्मार्क, फ्रान्स आदि देशों में समुद्र यात्राएँ, सागरी मार्गोंके नक्शे बनाना, उच्च कोटि की नौकाएँ बनाना और नौसेना की टुकडियाँ तैयार रखना महत्त्वपूर्ण बात हो गई |
उन दिनों खुष्की के रास्तें भारत से यूरोप में लाया जानेवाला माल उच्च कोटी का हुआ करता था | उसमें कपडा, रेशम, मोती, मूँगे, बेशकीमती नगीने, जवाहरात, मसाले, औषधी वनस्पतियाँ आदि प्रधान थे | उसके बदले में व्यापार करने के लिये युरोपीय देशों के पास कुशलता से बने शस्त्र, तोप, बन्दूक आदि थे | तलवार और तीरों के दिन बीते नही थे लेकिन अब तोपें भी साथ में गईं, उनके पीछे पीछे बन्दूकें भी |
भारत के साथ व्यापार कायम रखने के लिये बडे पैमाने पर शस्त्र निर्माण का काम किया जाने लगा | इस प्रकार शस्त्रनिर्माण एक ऐसा बडा उद्योग बना कि आज भी वह संसार के प्रमुख उद्योंगो में एक है |
वास्को--गामा ने तय किया कि वह यूरोप से भारत आने का समुद्री मार्ग खोजकर उसके नक्शे बनाएगा | इस प्रकार समुद्र के रास्ते भारत पहुँचनेवाला वह पहला व्यक्ती था | उसके बाद कोलंबस भी चल पडा भारत की खोजमे और उसने ढूँढ लिया एक नया प्रदेश जिसका नाम पडा अमरीका | इस प्रदेश में खनिज संपत्ति प्रचुरता से थी जिसका उपयोग आगे चलकर शस्त्र निर्माण के लिये होता रहा |
इस प्रकार युरोपीय देशों से समुद्र के रास्तें बडी बडी व्यापारी संस्थाएँ भारत में आने लगीं | इधर हमने स्वयं ही अपने आप पर निर्बन्ध लाद लिये और समुद्र को लांघना धर्म निषिद्घ करार दे दिया | मुझे इस बात पर आश्चर्य है कि जिस संस्कृती में पृथ्वी प्रदक्षिणा की बात कही गई, वसुधैव कुटुम्बकम्‌ की बात की गई, समुद्र को लांघकर लंका में प्रवेश करने वाला मारूती पूजनीय हो गया, उसी देशमें समुद्र यात्रा को कब क्यों और कैसे धर्म निषिद्घ कहा गया ?
अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी एक अलग महत्त्व रखती है | इन दो सौ वर्षों में विज्ञान की प्रगति अभूतपर्व गति से हुई | साथ ही उद्योग-जगत की क्रान्ति का महत्त्व इसलिये है कि इस नई क्रान्ति ने हस्त उद्योगों की छुट्टी कर दी और मशीनों द्बारा असेंब्ली लाइन पर एक साँचे में ढले सैंकडों उत्पादन बनने लगे |
यही समय था जब शस्त्र और नौसेना रखने वाले देशों ने अन्य देशोंपर अपना राज जमा लिया | उधर लोकतंत्र की जडें भी मजबूत हो रही थीं | अतएव बीसवीं सदि में जिन जिन देशों ने स्वतंत्रता की लडाई लडीं, उन सभी ने लोकतंत्र के आदर्शों पर, खास कर तीन आदर्शोंपर - न्याय समता, और बन्धुता पर जोर दिया | यही कारण है कि आज इतने अधिक देशों ने लोकतंत्र को अपनाया | इस नई राज्यव्यवस्था में सेना की आमने सामने लडाईयाँ, भूभाग जीतना आदि अवधारणाएँ भी पीछे छूटने लगीं | वायुसेना और बम के आविष्कार के कारण लडाइयों में एक नया आयाम गया |
साथ ही आक्रमण के बजाय व्यापारी संबंध बढाने का दौर चल पडा | मुगल शासन काल में अंग्रेज, फ्रान्सिसी, डच, पुर्तगाली लोगों ने अपने व्यापारी केंद्र भारत में बना लिये थे जिसके लिये उन्हें मुगल शासकों ने मंजूरीयाँ दी थी | इस प्रकार जहाँ त्रेता और द्बापर युग में राज्य जीतना प्रमुख लक्ष्य था उसकी जगह व्यापार जीतना लक्ष्य बन गया |
आज राजे महाराजाओं की अपेक्षा उत्पादन मे अग्रगण्य उद्यमी, व्यावसायिक कंपनियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण हैं | जिसे हम सर्विस सेक्टर कहते हैं, जैसे बँकिंग, कम्प्यूटर्स, आवागमन, मोबाइल, इंटरनेट - आदि सेवाएँ देने वाले सेक्टर्स आगे आने लगे हैं | अर्थात्‌ अब ब्रह्मदण्ड या राजदण्ड के नही बल्कि अर्थदण्ड का युग चल रहा है | और इसके सेवाकारी (सेवाभावी नही) युग में बदलने की संभावना भी खूब है |
सारांश यह की जैसे जैसे युग बदलते गए - सत्य से त्रेता, त्रेता से द्बापर और द्बापर से कलियुग आया वैसे ही वर्णोंका महत्त्व भी बदलने लगा - पहले ब्राह्मण, फिर क्षत्रिय, फिर वैश्य और शूद्र वर्ण अधिक प्रभावी होते गये |
आर्थिक संपत्ति की माप करने के लिये कभी कृषि - जमीन और पशुधन - जैसे गोधन, अश्वधन और हाथी - प्रमाणभूत थे | लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के बाद जैसे जैसे मशीन से वस्तुएँ बनने लगीं और उनका उत्पादन आदमी की हाथ की बनी वस्तुओं की तुलना में हजारो - लाखों गुना अधिक बढ गया, वैसे वैसे उद्योग और उद्यमी अर्थात्‌ जिसे हम सेकंडरी सेक्टर ऑफ प्रॉडक्शन कहते हैं, उसका महत्त्व बढ गया | फिर व्यापार बढा, तो टर्शियरी सेक्टर अर्थात्‌ सर्विस सेक्टर का महत्त्व बढा |
जो चार पुरूषार्थ बताये गये - अर्थात्‌ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, उनमें से काम अर्थात्‌ उपभोग का महत्त्व कलियुग में अत्यधिक बढ गया | हम अधिक से अधिक उपभोगवादी हो रहे हैं | हालाँकि काम भी एक पुरूषार्थ है - क्यों कि इसीसे कलात्मकता को प्रश्रय मिलता है | फिर भी उपभोगवाद की अति हो जाती है तो सर्वनाश हो जाता है | इसका उदाहरण महाभारत मे मिलता है | जब युद्घ समाप्त हुआ तो पृथ्वी के प्राय: सभी राजे और राज्य नष्ट हो चुके थे | हस्तिनापुर से दूर द्वारका में यदुवंशी - राजाओं ने युद्घ में भाग नही लिया था | अब वे निश्चिंत थे | अगले कई वर्षों में कोई युद्घ नही आने वाला था | उन्हें क्षत्रियोचित पराक्रम दिखाने की कोई गरज नही आने वाली थी | वे भोग की तरफ मुडे | क्रीडा, द्यूत और शराब, इन्हीं मे ऐसे डूबे कि आखिर आपस में ही लडकर यदुवंश के सारे क्षत्रियों का नाश हुआ |
आज के युग में अर्थव्यवहार को अत्यधिक महत्त्व है और इसका आरंभ अठारहवीं सदी में जो औद्योगिक क्रान्ति आई वहाँ से है | पहले उत्पादन और व्यापार विकेंद्रित थे लेकिन औद्योगिक क्रान्ति ने दिखा दिया कि वे केंद्रित तरीके से भी किये जा सकते हैं | आज इक्कीसवीं सदि में हम केंद्रित और विकेंद्रित दोनों व्यवस्थाओं को तौल सकते हैं | विकेंद्रित व्यवस्था सर्वसमावेशक होती है | वह अधिक टिकाऊ भी होती है - दीर्घकालीन होती है | लेकिन केंद्रित व्यवस्था में हजारों गुना अधिक उत्पादनक्षमता होती हैं | इसीलिये उसके आगे-पीछे के ताने-बाने भी उसी तरह बुनने पडते हैं | यदि एक फलों का जूस बनाने की फॅक्टरी हो तो उसे रोजाना अमुक टन फल, इतना पानी, इतनी बिजली, इतने खरीदार भी चाहिये - उन्हें आकर्षित करने को ऍडव्हर्टाइजमेंट भी चाहिये | ऐसे समय कई बार नैतिक, अनैतिक का विचार भी दूर रखना पडता है | यदि अमरीका में शस्त्र बनाने फॅक्टरियाँ हैं, और उन्हें चलना हैं तो जरूरी है कि संसार में कोई कोई दो देश युद्घ की स्थिती में हों और उन्हें शस्त्र खरीदने की जरूरत बनी रहे | या जब कोई कंपनी लाखों युनिट इन्सुलिन बनानेवाली फॅक्टरी चलाती है तो जरूरी हो जाता है कि लोगों को डायबिटीज हो |
औद्योगिक क्रान्ति आई तो उसमें उतरनेवाले लोगों को नए हुनर, नए तरीके सीखने की आवश्यकता पडी | इसी प्रकार आज का युग जो टर्शियरी सेक्टर का युग है, इसके लिये आवश्यक हुनर भी कुछ अलग तरह के हैं। जैसे - फाइनान्सियल मेनेजमेंट, कम्प्यूटर्स, फिल्में बनाना, इव्हेंट मॅनेजमेंट, ये ऐसे हुनर हैं जो खेती करने या प्रॉडक्शन इंजिनियरिंग से नितान्त भिन्न है

आज तीन नए सेक्टर्स सर्विस सेक्टर से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो रहे हैं | चाहें तो हम उन्हें चतुर्थ, पंचम और षष्ठ सेक्टर कह सकते है | एक है इन्फ्रास्ट्रक्चर का सेक्टर - जैसे नए रास्ते, नए मकान, नई ओएफसी केबल की लाइनें इत्यादि | दूसरा है इन्फार्मेशन टेक्नॉलॉजी का सेक्टर | इसे भले ही सर्विस सेक्टर में माना जाता था पर अब इसे अपना अलग दर्जा दिया जाये इतना इसका स्वरूप बदल रहा है | तीसरा अति महत्त्वपूर्ण सेक्टर है RD - HRD का | अर्थात्‌ एक रिसर्च और उसके साथ ह्यूमन रिसोर्स डेव्हलपमेंट भी | हुनर अर्थात्‌ कौशल्य की शिक्षा, पेटंट, इन्टलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट, आदि अब एक नये सेक्टर के रूप में आगे रहे हैं | शायद इन्हीं के कारण भविष्यकाल युगान्तर घटेगा |
औद्यागिक क्रान्ति ने एक नए युग को जन्म दिया था| इसी प्रकार बिजली और उससे अधिक बल्ब की खोज ने एक नया युग ला दिया | एडीसन ने बल्ब का सफल निर्माण किया, उससे पहले तेल जला कर उजाला किया जाता था | उसकी सीमाएँ थीं | रात्रीपर अंधेरे का साम्राज्य हुआ करता | बहुत कम जगहों पर ही रात में कोई व्यवहार चल पाते | लेकिन अब चौबीस घंटे काम में लगाये जा सकते हैं | बल्बके आविष्कार के साथ साथ रात्री की अपनी एक अलग संस्कृति बन गई जो दिन की संस्कृति से अलग लेकिन उतनी ही कर्मशील है | इसी प्रकार रेडियो, टीव्ही, मोबाईलों ने अलग क्रान्ति लाई है | टिश्यु कल्चर और क्लोनिंग से एक नई क्रान्ति रही है|

लेकिन मेरी मान्यता है कि केवल आविष्कार से या क्रान्ति से युगान्तर नही होता | जब उस आविष्कार के कारण समाज में जीवन मूल्य बदलते हैं और समाज व्यवस्था बदलती है, तब युगान्तर होता है | और इसके लिये आवश्यक है कि मूल्यों की चर्चा होती रहे |
महात्मा गांधी और बाबासाहेब आंबेडकर ने अस्पृश्यता को खतम कर एक नये जीवन-मूल्य में लोगों को ढाल दिया - और इस प्रकार एक युग परिवर्तन कर दिया | राजा राममोहन रॉय ने सती की प्रथा बंद करवा कर और जिन जिन मनीषियों ने स्त्री शिक्षा को बढावा दिया - उन सबों ने एक और युग परिवर्तन किया | ऐसे युगान्तर के पर्व में वर्ण व्यवस्था, अर्थ व्यवस्था, कौशल्य प्रबंधन (स्किल मॅनेजमेंट), राज्य व्यवस्था इन सबको कसौटी पर चढना पडता है और यदि वे खरे उतरे, तभी टिक पाते हैं | यदि नही टिक पाये तो अराजक की स्थिती निर्माण होती है जो कई समाजों और सभ्यताओं को मिटा जाती है | कुछेक किसी खास गुट के आसरेसे टिक जाती हैं | आवश्यक है कि ऐसी टिकनेवाली और डूबनेवाली सभ्यताओं का लेखा जोखा हम रख सकें | इसीलिये RD-HRD का महत्त्व है |
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मंगलवार, 15 नवंबर 2016

सांगली में कलेक्टरी (अपूर्ण)

8/12/06
सांगली में कलेक्टरी (अपूर्ण)

सन् १९८३ जनवरी में महाराष्ट्र के सांगली जिले में कलेक्टर के पद पर मेरी नियुक्ती हुई। इससे पहले करीब डेढ वर्ष में इसी जिला परिषद पर मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर थी। अगले डेढ साल मैं कलेक्टर रही। इन तीन वर्षों मे मैंने जो काम किये उसमे से देवदासी आर्थिक पुनर्वस प्रकल्प की चर्चा तो कई जगह हुई है। लेकिन कुछ और भी काम मैंने किये जो लीक से हटकर थे।
उस दिनों में भी सांगली जिले पर से अकाल की छाया समाप्त नही हुई थी। यहाँ के तीन तहसील शिराळा, वाळवा और तासगांव के लिये अकाल का कोई खतरा नही होता।क्यों कि ये तीनों जिले कृष्णा, वारणा और येरळा नदियों के पानी से बारह महीने सिंचन का लाभ पाते हैं।तीन पूर्वीय तहसील जत, कवठे महांकाळ और आटपाडी , कायम ही रेनशॅडो झोन में पडते हैं। अर्थात् बारिश हुई तो हुई और न हुई तो न हुई। बचे दो तहसील- मिरज और खानपूर जिनको अंशतः पानी मिल जाता है और कई बार अकाल के प्रकोप से जूझना भी पडता है।
१९७२-७५ में तीन वर्ष तक लगातार आधे से अधिक महाराष्ट्र मे भारी भयंकर अकाल पडा। उसके परिणाम स्वरूप
एक योजना बनी- रोजगार हमी योजना या एम्प्लायमेंट गॅरंटी स्कीम। इसके दो भाग थे। पहला था गांव गांव से जो अकालग्रस्त लोग गांव छोडकर अनाज की तलाश में भटक रहे थे उन्हें तत्काल कोई मजूरी वाला काम उपलब्ध कराया जाय ताकि उनकी कुछ आमदनी हो जिससे वे अनाज खरीद सकें। ये सारे काम अकुशल किस्म के होते थे प्रायः ये काम मिट्टी, कंकड ढोना, रास्ते बनानाया छेटे-बडे बांध बनाना, तालाब की सुदाई आदि प्रकार के होते थे। स्कीम का जो दूसरा भाग सोचा गया था वह प्रशिक्षा से जुडा हुआ था। सोच यह थी कि वे जो अकुशल काम करने वाले लोग होंगे उन्हें धीरे धीरे कुछ कौशल्य-शिक्षा, भी दी जायेगी ताकि वे कुशल या कमस कम अर्धकुशल कारीगर बनें और उन्हें अपनी आमदनी बढाने का मौका मिले। अब ये अलग बात है कि इस दूसरी सोच के प्रति १९८१ तक कोई खास योजना नही बन पाई। जब ऐसी योजना बनी तो वह एकात्मिक ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) के तहत बनी- और सही अर्थों मे वह सफल नही हो सकी। खैर।
मेरे सांगली आने से पूर्व के दस वर्षों में अकाल ग्रस्त चारों तहसीलों में सडकें बनाने के कई काम पूरे हो चुके थे और सिंचाई के लिये बडे और छोटे इरिगेशन प्रोजेक्टस् भी लिये जा चुके थे। अब कोई ऐसे बडे
रास्ते या सिंचाई तलाब के काम नही बचे थे जिनपर एक साथ पांचसौ हजार, दो हजार मजदूर लगाए जा सकें। पिछले दस वर्षों का परिपाट यह था कि पीडब्ल्यूडी या इरिगेशन डिपार्टमेंट से कोई एक बडा प्रोजेक्ट बनवाकर मंजूरी दे दो और दो तीन वर्ष- उस इलाके की चिन्ता समाप्त। चाहे जितने लोग अकुशल मजबूरी करना चाहें, सब को उन कामों पर रुमविष्ट किया जा सकता था। लेकिन अब परिस्थिती बदल चुकी थी। ऐसे कार्यस्थल अब समाप्त हो चले थे। तब मुंबई मंत्रालय से समाप्त हो चले थे। तब मुंबई मंत्रालय से सूचना आई कि कृषि और वनी करण संबंधित काम शुरु किये जायें। वनीकरण में गढ्ढों की खुदाई, पेड लगाना और चारों ओर बाड के लिये छोटी- डेढ दो फूट उंची, मिठ्ठी या पत्थर की दीवार बनाना शामिल था। कृषि आधारित काम में अक्सर नाली बंडिंग और किसान के खेत को समतल कर उसपर कण्टर- बंडिंग के काम किये जाने थे।
मैंने महसूनकिया कि इन कामों का निर्देश देते समय समग्र चिंतन की बात पीचे छूट गई थी। सीधा हिसाब कोई नही लगाना चाहता था कि ऐसे काम पर हम कितने मजदूर लगा पायेंगे और कितने दिनों तक। तब सांगली के इन चार तहसिलोंसे काम की माँग करने वाले करी पचास से पचपन हजार मजदूर दर्ज थे। नाला बंडिंग, कण्टूर बंडिंग या बनीकरण में एक काम पर पचास से सौ के करीब मजदूर लगाये जा सकते थे और काम को करीब तीन महिनो में निपटाया जा सकता था। अर्थात् करीब पांच से दस हजार मनुष्य दिवस का काम निकलता था और तीस रुपये रोजाना से मजदूरी पकडने पर काम की लागत तीन-लाख से अंदर ही हो जाती। इसकी तुलना में पहले वाले रास्ते या सिंचन तलाब के कामों मेंदस लाख तक मनुष्य दिवस लगते और उनकी लागत करोडों में हो जाती। अर्थात् रोजगार हमी योजा में कृषि और वनीकरण के काम लेने के लिये सैकडों कामों का नियोजन करने की जरूरत थी। यदि एक काम पर सौ मजदूर लगाये जा सके तो पचास हजार मजदूरों के लिये पांच सौ काम चाहियें। हरेक का प्लान एस्टिमेंट बनाओ, मेजर मेंट लो तब जाकर काम शुरु हो सकता था। फिर काम पर सुपर विजन कैसे किया जाय? प्लान बनाने के लिये ऍग्रीकल्चर ऑफिसर और उसके तीन सर्वेयर्स की टीम बनाकर हम उन्हें महीने में अमुक अमुक प्लान बनाने के निर्देश देते थे। लेकिन उस काम को करवाने के लिये अलग टीम की आवश्यक्ता थी। यह स्टाफ मंजूर करवाना हो तो सरकार के पास जाना पडेगा।

मुझे याद आता है कि पहली बार सांगली जिले में इस तरह के प्लान बने जिसमें होके तहसील में जो दलके ऍग्रीकल्चरल सर्कल होते थे उनके हिसाब से सारणीयाँ बनीं। किस सर्कल में कितने मजदूरों को काम मुहैय्या करने की जरूरत थी यह चार्ट पिछले तीन वर्षों के माहवार हाजिरी के चार्ट को आधार पर वना। उसमें कितने काम मुहैय्या कराने पडेंगे, उनके प्लान बनाने के लिये कितनी टीम्स चाहिये और काम करवाे के लिये कितनी। इस पूरी जरुरत की तुलना में हमारे पास प्रत्यक्षतः काम करने वाले कितने अधिकारी और स्टाफ था और हमें कितने और की आवश्यकता थी। यह सारे गणित हमने सारणीबद्ध रूप में किये।

बुधवार, 9 नवंबर 2016

**********वापरा 11 भगवद्गीता प्रणीत बुद्धियोग -- चित्रप्रत

11 भगवद्गीता प्रणीत बुद्धियोग -- चित्रप्रत


(बहुधा अश्विनीने डीटीपी केले होते)











शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

शार्टकट से चिरंतन कुछ भी हासिल नहीं होगा

शार्टकट से चिरंतन कुछ भी हासिल नहीं होगा

देशबन्धु 10, AUG, 2012, FRIDAY 
लीना मेहेंदले



आखिर उपोषण इत्यादि से जनलोकपाल बिल नहीं लाया जा सकता- यह बात समझ में आने पर टीम अन्ना ने फैसला लिया कि अब वे इसे लाने के लिए राजकीय रास्ता अपनाएंगे और इसीलिए 2014 के लोकसभा चुनाव में एक राजकीय पक्ष के रूप में उतरने का निर्णय लिया। इस निर्णय पर तीव्र प्रतिक्रियाएं हुई हैं जिनमें क्रोध, हतबलता, उपहास और आशा ये चारों रंग अलग-अलग प्रतिशत में घुले हुए हैं।
मैं इस निर्णय को सही या गलत तो नहीं मानती लेकिन मेरे विचार में यह नितांत अपर्याप्त है। इसी कारण इसके कुछ पहलुओं को जांचना चाहती हूं। किशोरावस्था में पढ़ी हुई विनोबाजी की एक स्मृति याद आती है। स्वतंत्रता पाए हुए अभी आधा दशक भी पूरा नहीं हुआ था। विनोबाजी ने भूदान यज्ञ चलाया। बड़े जमींदारों को प्रोत्साहित किया कि वे अपनी जमीन भूमिहीनों के लिए दें। उन्हें बिहार, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश में काफी यश मिला। यज्ञ अभी चल रहा था। भूमि का बंटवारा शुरू हुआ था। एक अभूतपूर्व घटना घट रही थी।
नेहरूजी ने बुलावा भेजा विनोबाजी से कहलवाया 'आप सरकार से बाहर रहकर इतना इच्छा काम कर रहे हैं- सोचिए सरकारी ताकत भी इस अच्छे काम के पीछे लग जाए तो यह काम कई गुना अधिकता से हो सकता है, अत: आप सरकार में आ जाइए- कृषि मंत्री का पद स्वीकार करिए और सरकार की प्रतिभा को भी चमकाइए।'
विनोबा ने उत्तर दिया- 'नहीं आऊंगा। हमारे देश ने लोकतंत्र को अपनाया है- राजतंत्र को नहीं। लोकतंत्र की आवश्यकता है कि इसमें लोगों को लगना चाहिए कि उनके अच्छे इरादे और अच्छे कामों से समाज का विकास हो सकता है- हर विकास के लिए सरकार की या सरकारी सत्ता की आवश्यकता नहीं है। यदि लोगों को लगा कि कोई विकास सरकार के बिना नहीं हो सकता है, तो यह लोकतंत्र के लिए मनोबल घटाने वाली बात होगी। लोकतंत्र में लोगों के विश्वास को बचाने के लिए आवश्यक है कि मैं यह काम सरकार से बाहर रहकर करूं-भले ही छोटे स्तर पर होता हो।'
1952 और 2012- साठ वर्ष बीत गए। इस दौरान धीरे-धीरे सामाजिक कार्यों की व्याप्ति और पहुंच और दृष्टि व दायरा-सभी सिमटते चले गए हैं। अब यह स्थिति आ गई है कि कोई अच्छा काम करना हो तो लगता है कि इसके लिए सरकार में सत्ता हासिल किए बिना बात नहीं बनेगी। 
और सत्ता का खेल भी अब खेल नहीं रहा, बल्कि एक मारो या मरो वाला मुकाम सा बन गया है। सत्ता में आने के लिए पहले चाहिए पैसा। फिर चाहिए बडी संख्या- उसके लिए बड़ा संगठन-उसके लिए बड़ा पैसा। यह केवल एक आवश्यकता है। दूसरी आवश्यकता है कि लोगों में अलगाव, आवेश, आक्रोश भर दिया जाए और दावा किया जाए कि हम ही हैं- तारनहार। आज प्रत्येक पार्टी किसी न किसी भौगोलिक हिस्से में इस प्रकार के अलगाव को प्रोत्साहन देती हुई दिखाई देगी। इसी के लिए बाहुबली भी पालने पड़ेंगे। तीसरी आवश्यकता है कि दूसरों के अच्छे कामों का विरोध करो, उसे सफल न होने दो, क्योंकि दूसरे 'अच्छे' दिखे तो सत्ता में अपने लिए स्पर्धा खड़ी हो जाती है। चौथी आवश्यकता है समय की इतने कम समय में बडी सत्ता नहीं मिल सकती। फिर गठबंधन- जोड़-घटाव, लेन-देन का व्यापार शुरू हो जाता है।
इन चारों आवश्यकताओं को ध्यान रखने में किसी भी राजकीय पक्ष को इतना समय लगाना पड़ता है कि इनकी पूर्ति ही साध्य बन जाती है। फिर वह लक्ष्य कोसों दूर चला जाता है जिसे 'साधनों के लिए' सत्ता को साधन बनाने का फैसला लिया गया था। टीम अन्ना के निर्णय से लोगों में यदि क्रोध, उपहास या हतबलता की भावना आई है उसका कारण भी यही विवंचना है, भले ही इसे इतनी स्पष्टता से अभी नहीं देखा जा रहा हो।
अब दो प्रश्न पूछे जा सकते हैं- क्या कभी भी किसी नए व्यक्ति का राजनीति में प्रवेश हो ही नही सकता? ऐसा नहीं है- यदि किसी की सामाजिक कार्य की प्रतिमा बन गई हो तो वह चुनाव में जीतकर आ सकते हैं- इसका एक उदाहरण है गुजरात के एक पुलिस कमिश्नर (शायद सूरत के) जो नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरे, जीते भी। लेकिन आज वे कहां हैं? या फिर आंध्र में हाली चुनाव में एक सीट जीतने वाला प्रजातंत्र पक्ष जो अब कांग्रेस में विलीन हो गया है। इसलिए यदि टीम अन्ना ने राजकीय पक्ष की स्थापना का निर्णय लिया हो तो लोग पहले उसके उम्मीदवारों का सामाजिक कार्य पूछेंगे। आज अन्ना हजारे को छोड़ किसी और सदस्य का सामाजिक कार्य क्या है? वह कहीं दिखाई नहीं देता तब तक चुनाव लडने का सपना कोई खास सफलता नहीं देने वाला।
एक दूसरा प्रश्न भी पूछा जा सकता है यदि लोकतंत्र में सत्ता पाने के लिए उन चार आवश्यकताओं को पूरा करना पड़ता है तो कई अन्य राष्ट्रों में यही लोकतंत्र प्रणाली क्यों विकास-गंगा बन पाई। उदाहरण स्वरूप यदि यूरोपीय देशों को देखें तो लगता है कि वहां लोकतंत्र सशक्त है और विकास का रास्ता प्रशस्त कर रहा है। फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं तो इसका भी कारण है उन नागरिकों की सार्थक समाज कार्य करने की क्षमता। इसका पाठ वहां विद्यार्थी दशा से ही आरंभ होता है जबकि अपने यहां छात्र-संगठन भी भ्रष्ट राजनीति में लिप्त हो जाते हैं। मैं मानती हूं कि राजनीति में घुसकर सत्ता पाने का प्रयास एक शार्टकट की तरह है। जबकि सामाजिक काम के रास्ते अपना साध्य पाने के लिए एक लम्बा सफर तय करना पड़ता है। अत: किसी भी टीम को यह लगना स्वाभाविक है कि शॉर्टकट का रास्ता लिया जाए। लेकिन मुझे नहीं लगता कि ठोस सामाजिक कार्य के बगैर वह मंजिल तक पहुंचाएगा।
टीम अन्ना राजनीति में असफल होती है तो यह पूरे देश के लिए दुखद घटना होगी क्योंकि भ्रष्टाचार हटने का कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखता। लेकिन उनकी सफलता का रास्ता हजारों-लाखों के छोटे- बड़े सामाजिक कार्यों के पड़ाव से ही गुजरना है शॉर्टकट से चिरंतन कुछ भी हासिल नहीं होगा।
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बुधवार, 3 अगस्त 2016

एफडीआई का जबर्दस्त जंजाल

http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/3398/10/0#.V6GwtdR97mE

एफडीआई का जबर्दस्त जंजाल

deshbandhu 14, DEC, 2012, FRIDAY


लीना मेहेंदले
खुदरा -बिक्री का क्षेत्र विदेशी निवेशक के लिये खुला करने के अर्थात उसमें एफडीआई लाने के मुद्दे पर राजकीय मत दो हिस्सों में बंटा है- हर पार्टी में और सामान्य जनता में भी एक पक्ष कहता है कि यह विदेशी फाँस को आमंत्रण है और दूसरा पक्ष कहता है कि यही एकमेव उध्दारकर्ता है।
किसान कहता है- हमें सदा से दबाया जा रहा है - भाव नहीं मिल रहे - इसका उत्तर दो।
ग्राहक कहता है, जीने के लिये भरपेट खाना अत्यावश्यक है, वह धन-धान्यादि कृषि-उत्पाद ही महंगा हुआ तो हम क्या करेंगे।
खुदरा विक्रेता कहता है- हमारे 4 करोड़ परिवार अर्थात 16-20 करोड़ लोग इसी खुदरा बिक्री का रोजगार करके रोज अपना पेट भरते हैं, हमसे यह रोजी-रोटी मत छीनो।
हर कोई कहता है कि दलाल और बिचौलिये सारी मलाई खा जाते हैं। खुदरा विक्रेता जो एक ठेलेवाला है या रास्ते पर सब्जी बेचनेवाला है- वह कहता है- देखो, मुझे दलालों में मत गिनो- और वह सही है। यह दलाल हैं जो देशी पूंजी-निवेशक हैं या फिर विदेश से आ सकते हैं। और जरूरी नहीं कि वे सब मलाईखोर भ्रष्टाचारी हों। 
इस प्रकार एक ओर यहां उत्पादक के सम्मुख ग्राहक है और खुदरा विक्रेता, राजनेताओं को अपनी पड़ी है कि उस खुदरा व्यवस्था को तोड़कर हम दूसरी लायेंगे तो हमें ये मिलेगा- लेकिन कहेंगे कि जनता को वो मिलेगा। फिर आयात-निर्यात की ऐसी गलत नीतियां बनायेंगे कि उत्पादक और ग्राहक दोनों में हाहाकार मचे और फिर ये कह सकें कि अब हम तुम्हारे भले के लिये देखो विदेशी मेहमानों को ले आये। फिर इसमें हमारी न्याय और दंड व्यवस्था भी कारगर नहीं रहेगी क्योंकि कानून ही ऐसे सुराखों वाले हैं। 
इसलिए पहले यह अंतर समझना होगा कि मलाई खाने वाले दलाल कौन हैं? यहां भंडारण व्यवस्था का महत्व सामने आता है। बिना अच्छी भंडारण व्यवस्था के कोई भी दलाल या व्यापारी अपना काम नहीं कर सकता। इसलिए मुनाफाखोरी रोकनी हो तो पारदर्शक, और कार्यक्षम भंडारण व्यवस्थापन होना चाहिए साथ ही उसे मुनाफाखोरी से भी बचना पड़ेगा।
ऐसी भंडारण व्यवस्था लाने के लिए सरकार ने कुछ प्रयास अवश्य किए। आज भी सर्वाधिक भंडारण सरकारी क्षेत्र में या सरकार की सहायता से होता है। उदाहरणस्वरूप फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया है, या वेयर हाउसिंग कार्पोरेशंस हैं, या नाफेड है। और ऐसा भी नहीं कि पहली बार-यह काम सरकारी क्षेत्र में हो रहा हो। सदियों से चली आ रही राय व्यवस्था में हर राजा का कर्तव्य होता था कि वह अपने राय के लिए अनाज के भंडार-घर बनवाए और कोषागार। पटना में आज भी एक अति विशाल 'गोलघर' मौजूद है। जहां कई सदियों पहले हजारों मन अनाज सुरक्षित रखने की व्यवस्था थी। बाजारों के लिए चबूतरे बनवाना और वहीं से थोक व खुदरा व्यापार की व्यवस्था करना भी अच्छे राय का प्रतीक माना जाता था।  मुझे आज भी याद आते हैं बचपन में छोटे गांवों में देखे हुए साप्ताहिक बाजार। मेरे अपने जन्मगांव में ऐसे दो स्थान नियत थे। एक रोजाना बाजार के लिए जहां एक बड़े क्षेत्रफल में फर्श लगवाई हुई थी जाने किस जमाने से ताकि धान्य, अनाज, शाक, भाजी, फल इत्यादि सीधे उसी पर उड़ेल कर रखे जा सकें। दूसरी-जगह थी जहां साप्ताहिक बाजार के लिए दूर-दूर गांवों से लोग आते थे। यही दृश्य कमोबेश हर बड़े गांव में तहसीलों में देखने को मिलता। फिर भी इन बाजारों में आने वाले नाशवंत वस्तुओं की बरबादी हो ही जाती थी। साथ ही किसान या अन्य उत्पादकों को बहुत घूमना पड़ता था। उनके लिए दूसरा पर्याय यही होना कि अपना उत्पाद कम दाम पर ऐसे व्यापारी या आढ़तिया को बेचे जिसके पास भंडारण के संसाधन हों।
यहां से हम आते हैं कृषि उत्पाद-बाजारों पर। महाराष्ट्र का उदाहरण देखें तो एमएपीएम(आर) एक्ट अर्थात् कृषि उत्पाद बाजार नियंत्रण का कानून 1963 में पारित हुआ और 1987 में इसमें कुछ बड़े संशोधन किए गए। आज की तारीख में ऐसे 295 मुख्य बाजार और 609 उप बाजार हैं, जिनमें से केवल 100 मुख्य बाजार ही ए श्रेणी में अर्थात् 1 करोड़ रुपए से अधिक का व्यापार (एक वर्ष में) करते हैं। साथ ही इन बाजारों की कार्यक्षमता, भ्रष्टाचार या ईमानदारी इत्यादि गुणात्मक विवेचना कभी भी नहीं हुई। यदि इन बाजारों की संरचना देखें तो हरेक बाजार के भौगोलिक क्षेत्र में बसने वाले सारे किसान, उस इलाके के पंचायत सदस्य और साथ ही जिन्हें एजेंसी बांटी गई, ऐसे सारे एजेंट इस बाजार के सदस्य माने जाते हैं। लेकिन प्रत्यक्षत: वस्तुस्थिति यही है कि पूरे एपीएमसी पर केवल एजेंटों का अर्थात् मुनाफाखोरों का वर्चस्व रहा है। और यह मुनाफाखोर व एजेंट भी अंतत: राजकीय नेताओं के पिछलग्गू ही रहे हैं। इस प्रकार अच्छे उद्देश्य से बने एपीएमसी भ्रष्टाचार के सत्ताकेन्द्र बन गए और किसान को उनसे वह सुविधा, फायदा और उचित दाम नहीं मिले जिसकी अपेक्षा इस कानून में की गई थी। पिछले पचास वर्षों में सहकार क्षेत्र की महाराष्ट्र में दुर्गति हुई है। सत्तर और अस्सी के दशक में आश्वासक दिखने वाली सहकार नीति भ्रष्टाचार में ऐसी धंसी कि बड़ी-बड़ी संस्थाएं ध्वस्त हो गईं। महाराष्ट्र की प्राय: सभी सहकारी चीनी मिलें, सूत-और जिनिंग की मिलें, सहकारी बैंक और एपीएमसी जैसी संस्थाएं तेजी से बनीं, चलीं, विकास की आशा के निर्माण किया और भ्रष्टाचार के तूफान में दम तोड़ दिया।
उधर सरकार की अपनी जो भंडारण और वितरण की व्यवस्था थी, अर्थात् वेअर हाउसिंग, एफसीआई या फिर रेशनिंग अर्थात् पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम, वहां भी जमकर भ्रष्टाचार हुआ। एफसीआई का गत दस वर्षों का इतिहास देखकर ऐसा लगता है मानो ये बियर कम्पनियों के लिए आरक्षित रखा गया हो। हजारों टन अन्न सड़ाया जाता है ताकि बियर और अन्य शराब बनाने वाली कम्पनियां इसे सस्ते में खरीद कर मुनाफा कमा सकें। ऐसे आर्थिक दर्ुव्यवहार की न ही जल्दी कोई सुनवाई होती है और न ही उन्हें कोई कड़ी सजा देने का प्रावधान किसी कानून में है। हाल ही में नीरा यादव जो कभी उत्तर प्रदेश की मुख्य सचिव रह चुकी हैं और जिनकी भ्रष्ट सम्पत्ति दो से तीन हजार करोड़ के घर में आंकी जाती है, उस पर भ्रष्टाचार का आरोप सिध्द हुआ तो सजा हुई केवल 3 वर्ष की। और यह भी कहीं न्यूज में नहीं आया कि उसकी संपत्ति का क्या हुआ! क्या उसे सरकारी खजाने में जमा कराया गया? 
हमारे देश के किसान तीन प्रकार के हैं- अल्प-भू-धारक, अत्यल्प-भू-धारक और खेत-मजूरी करने वाले एक तरफ। मंझोले किसान जिनकी जमीन पांच एकड़ से पन्द्रह एकड़ के बीच है-जो खा-पीकर संतुष्ट हैं, लेकिन कृषि के चढ़ाव-उतार का असर भी झेलते हैं- वे एक तरफ। और बड़े किसान तीसरी तरफ।
पहली व दूसरी श्रेणी के किसान ऐसे हैं जिन्हें अपने उत्पाद का उचित मूल्य तुरंत चाहिए होता है। उनकी ऐसी क्षमता नहीं होती कि उत्पाद को रोक कर रखे या बिक्री के बगैर भी महीनों तक काम चला ले। उनके पास बेचने लायक उत्पादन भी कम होता है। लेकिन जो भी है, वही उनकी पूरे वर्ष की पूंजी है। इसीलिए वह तत्काल मूल्य चाहता है और उचित मूल्य भी और वह दोनों का हकदार भी है। लेकिन उसे उचित मूल्य बिना देर के मिले इसके लिए आवश्यक है कि देश में पणन व्यवस्था का अच्छा-खासा विकेन्द्रीकरण हुआ हो। प्रोक्यूअरमेंट संबंधी नीतियां व खरीद की व्यवस्था कार्यक्षमता व पारदर्शिता के साथ हों। ऐसे विकेन्द्रीकरण में हम कहां किस कारण से असफल रहे हैं। इसका एक उदाहरण मैं देना चाहती हूं। महाराष्ट्र में यदा-कदा नीति घोषित की जाती है कि इस वर्ष हम रेशम-व्यापार बढ़ाने के लिए कुछ करेंगे। इसमें किसान की एक अहम् भूमिका होती है। अब यदि महाराष्ट्र में सरकार चाहती है कि किसान रेशम कोष की पैदावार करे तो दो प्रमुख काम करने पड़ेंगे। किसान से रेशम कोष खरीद के जो केन्द्र खोजे जाएं वहां तत्काल भुगतान की व्यवस्था हो- वर्तमान में फाइलों को घूम-फिरकर आने में तीन महीने लग जाते हैं। दूसरी आवश्यक बात यह कि ऐसे खरीद-केन्द्र पर छोटी क्वेंचिंग मशीन भी रखी जाए और उसी केन्द्र के कर्मचारियों को जरा सी ट्रेनिंग देने की आवश्यकता होती है कि ठीक तरह से रेशम कोष को कैसे पकाते हैं- वह ट्रेनिंग दी जाए। 
इसी प्रकार मैंने देखा कि जहां भी विकेन्द्रीकरण की बात आती है, वहां थोड़ी सी नई तकनीक, थोड़ा सा नया ट्रेनिंग और व्यवस्थापन की अच्छी प्रणाली (इस उदाहरण में तत्काल भुगतान के अधिकार खरीद-केन्द्र-प्रमुख को देने की व्यवस्था) आवश्यक होती है। सरकार विकेन्द्रीकरण की बात तो करती है। लेकिन इन तीन आवश्यकताओं पर ध्यान नहीं देती और विकेन्द्रीकरण फेल हो जाता है। दूसरे भी कई क्षेत्रों में जहां सिंगल विण्डो सिस्टम की बड़ाई गाई जाती है और सिर धुना जाता है कि क्यों हमारे यहां सिंगल विण्डो सिस्टम नहीं है, वहां भी इन्हीं तीन बातों की कमी अक्सर देखी गई है।
पणन व्यवस्था के विकेन्द्रीकरण में यह कमी भी रही। अर्थात् दो कमियां- व्यवस्था न बना पाने की एक कमी और नियत में खोट की दूसरी कमी (मसलन एफसीआई द्वारा अनाज सड़ाया जाना) एमपीएमसी के व्यवस्थापन में भी यही कमियां रहीं और सरकार ने उन्हें सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया। उलटे महाराष्ट्र में तो कई वर्षों तक एकाधिकार खरीद की व्यवस्था चलवाई। 
0 कपास-एकाधिकार खरीद-किसान सरकार के अलावा अन्य को कपास नहीं बेच सकता।
0 वनोपज-एकाधिकार खरीद- आदिवासी अपने वनोपज ट्रायफेड के सिवा किसी और की नहीं बेच सकता।
0 गन्ना-एकाधिकार खरीद-किसान अपना गन्ना केवल उस चीनी-मिल को बचे सकता है जो उस गांव के गन्ने के लिए नीयत हो।
0 एपीएमसी किसान अपनी खेती उत्पाद केवल उन्हीं दलालों को बेच सकता है जिन्हें एमपीएमसी के क्षेत्र में आढ़त लगाने का ठेका मिला हो।
इन सबसे अलग-थलग एक सफल प्रयोग मैंने देखा कर्नाटक सिल्क एक्सचेंज का। जहां सदियों से चली आ रही दलालों की लूट को एकाधिकार के तहत रोका गया- लेकिन सूझबूझ के साथ। यहां एकाधिकार का अर्थ बहुत संकुचित रूप में अपनाया गया-बस इतना ही कि रेशम कोष की हर उपज और काते हुए रेशम सूत की हर खेप केवल और केवल सिल्क एक्सचेंज में ही बेची जा सकती है। लेकिन वहां खरीद का हक केवल सरकारी मोनोपोली नहीं होगा जैसा महाराष्ट्र कॉटन मोनोपोली पर्चेस एक्ट में था, या जैसा ट्रायफेड का एकाधिकार वनोपज के लिए है। यहां भी एपीएमसी की तरह बाहरी व्यापारी नीलामी में बोली लगा सकता है। लेकिन एपीएमसी की तुलना में दो बातें अलग हैं- पहली यह कि इनमें से कोई व्यापारी आढ़तिया या परमानेंटी लाइसेंसी नहीं है जैसा एपीएमसी में होता है। किसी भी नए व्यापारी को छोटी फीस वाली टेम्पररी मेंबरशिप लेकर उस-उस दिन की नीलामी में खरीदारी का हक होता है। दूसरी अलग बात यह है कि हर दिन की नीलामी में सरकार कार्पोरेशन केएसआईसी पहली बोली लगाएगा जो सपोर्ट प्राइज की तरह काम करता है और हर दिन आने वाली उपज का पन्द्रह से चालीस प्रतिशत उपज केएसआईसी द्वारा खरीदी जाती है। इसका अर्थ हुआ कि सरकारी कॉम्पिटीशन द्वारा दलालों का बैलेंस किया जाता है। साथ ही उपज लाने वाले किसान या कारीगर को नाममात्र शुल्क पर पणन की सुविधा और नाममात्र ब्याज पर ऋण की तत्काल सुविधा भी है ताकि किसान दो-तीन दिन इंतजार कर सके। अर्थात् जब सरकार ने मोनोपोली भी नहीं चलाई और ठेकेदारों की भी न चलने दी और पणन से संबंधित कई सुविधाएं उत्पादक को दीं- तब जाकर सिल्क एक्सचेंज की कल्पना ऐसी सफल रही कि पिछले तीस वर्षों में उसने बंगलोर का विश्व का सबसे बड़ा और उत्तम सिल्क-केन्द्र बना दिया है। इस प्रकार मैं देखती हूं कि एपीएमसी की दुर्दशा रोकने के लिए ऐसे उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन वास्तव में नहीं किए जाते। इसी कारण किसान की भावना है कि एपीएमसी में भी उसे उचित न्याय-उचित मूल्य नहीं मिलता। फिर वह इस एपीएमसी एक्ट से बचकर निकल भागने का प्रयास करता है। यही कारण था कि अभी छ:-आठ महीने पहले महाराष्ट्र सरकार को एक नोटिफिकेशन के जरिए करीब 30 प्रकार के कृषि-उत्पादों को एपीएमसी की सूची से हटाना पड़ा।
कुल मिलाकर चित्र यही निकलता है कि विकेन्द्रीकरण के लिए आवश्यक तीन बातों का प्रबंध न कर पाना पणन-भण्डारण में भ्रष्टाचार, और सारी व्यवस्था पर दलालों के माध्यम से नेताओं का कब्जा, सहकारिता क्षेत्र में नेताओं का भ्रष्टाचार-ऐसे कुछ कारण हैं जिनसे किसान को राहत देने में सरकार असफल रही। पिछले साठ वर्षों में इन बातों को दुरुस्त करने के लिए सरकार कम पड़ गई। और इसका उपाय ढूंढा गया-विदेशी पूंजी। विदेशी व्यापारियों को सहूलियत देकर यहां बसाओ और उन्हें बड़ा सत्ता-केन्द्र बनने दो। फिर चूंकि वे अत्यंत ईमानदार और कार्यक्षम होते हैं- अतएव हमारे देश में भी खुशहाली आएगी। यह है सरकारी तर्क। इस तर्क में चार अहम मुद्दे हैं और मुझे वे चारों गलत दिखते हैं। पहला मुद्दा है- चूंकि रिटेल व्यापार के मार्फत उत्पादक और ग्राहक के बीच की दूरी को कम करने में सरकार व दलाल दोनों कम पड़ गए, सो विदेशी, पूंजी लाओ यही तर्क अपनाया तो जो मैं पिछले कई वर्षों से बुजुर्गों के मुंह से सुनती आ रही हूं उसे सही मानना पड़ेगा। वे कहते थे कि इनसे तो अंग्रेज सरकार अच्छी थी। क्यों न उन्हीं को वापस बुलाया जाय?
दूसरा मुद्दा है कि हम फिर से विकेंद्रीकरण समाप्त कर रहे हैं और केन्द्रीकृत व्यवस्था ला रहे हैं, साथ ही इस केन्द्रीकृत व्यवस्था के सत्ता केन्द्रों पर विदेशियों को विराजमान कर रहे हैं।
तीसरा मुद्दा यह है कि जो विदेशी पूंजी निवेशक यूरोप-अमरीका में बडी र्ऌमानदारी दिखाते हैं, वे यहां आकर वैसा नहीं करते क्यों कि हमारे कानून अक्सर उनके विरूध्द निष्प्रभ हो जाते हैं। यहां आकर चाहे जितनी गलती, लूट, मनमानी वे कर लें- हम उन्हें सजा नहीं दिलवाते, पकड़ नहीं पाते, इसके उदाहरण हैं एनरॉन, भोपाल गैस कांड वाले यूनियन कार्बाइड, सिटी बैंक द्वारा जबरन ऋण वसूली के मामले इत्यादि। इसलिए उनके द्वारा हमारे साथ बेईमानी खिलवाड़ और शोषण नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। सरकार कहती है कि हमारे पास कारगर उपाय हैं- तो क्यों नहीं अब तक भोपाल गैस कांड में सजा हुई? क्यों मुआवजा नहीं दिया गया? अब तो यह बात भी खुलकर सामने आ गई है कि वॉलमार्ट या एनरॉन जैसी कम्पनियों की घूस से कोई परहेज नहीं है। केवल उसे नाम कुछ अच्छा सा दिया जाना चाहिए। बस! सो उसे घूस नहीं, बल्कि मत परिवर्तन कहते हैं। इसके अंतर्गत वॉलमार्ट ने खुद अमरीकी सीनेट की कमिटी के सामने कबूल किया। भारतीय राजकीय नेताओं का मत परिवर्तन करने के लिए पिछले चार वर्षों में 125 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसके कुछ दस वर्ष पहले एनरॉन के विरूध्द एक मामला अमरीका कोर्ट में चला जिसमें आरोप था कि उन्होंने अपने अमरीकी शेयर होल्डरों के साथ धोखाधड़ी की थी। उसकी सुनवाई के समय एनरॉन के भारतीय प्रोजेक्ट की कर्ता-धर्ता रेबेका मार्क ने अमरीकी कोर्ट को बताया कि भारत के उच्च पदस्थ नौकरशाह व मंत्रियों के प्रबोधन के लिए 800 करोड़ के आसपास खर्च किया है।
अब मान लो हमारी सरकार घूस के खिलाफ कड़ा कानून करती है और वे कहते हैं- हमने तो 'उनका जीवन स्तर बढ़ाने पर खर्च किया है' तो फिर तो हमारी सरकार उन पर मुकदमा भी नहीं करेगी। यदि क्षमता है तो आज ही की तारीख में वॉलमार्ट को बाहर का रास्ता दिखाइए-और यह भी बताइए कि किस-किस का मत परिवर्तन इन चार वर्षों में हुआ। अर्थात् सरकार का यह कहना कि हम कड़े कानूनों द्वारा अपने हितों की रक्षा करेंगे-यह एक ढकोसला है। ऊपर से तुर्रा यह कि केवल वॉलमार्ट ही नहीं, हमारे प्रधानमंत्री तो चीन को भी कह आए कि आपके देश का पूंजी निवेश हमारे देश में बहुत कम है, सो आइए और अपनी पूंजी लगाइए। उधर रक्षा-सलाहकार भले ही चीखते रहें कि अपना ओएफसी का जाल बिछाने का काम चीनियों को न सौंपा जाए- लेकिन विदेशी पूंजी के लिए उसे भी अनसुना किया जा सकता है। चौथा मुद्दा भी सोचने लायक है। कहीं यह विदेश पूंजी बनाम स्वदेशी पूंजी का झगड़ा तो नहीं है? नहीं- इसे पूंजी बनाम विकेन्द्रीकरण के रूप में देखना होगा। यदि विदेशी वॉलमार्ट अच्छा नहीं है तो क्या रिलायंस फ्रेश अच्छा है? दोनों स्थितियों में सत्ता केन्द्र बनने का मामला है जो अंतत: शोषण की ओर ले जाता है।