शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

XX मेरी प्रांतसाहबी -- भूमिका

मेरी प्रांतसाहबी -- आमुख -- ललित सुरजन

मेरी प्रांतसाहबी -- आमुख -- ललित सुरजन

भूमीका

     श्रीमती लीना मेहेंदले से मेरा पहला परिचय हिन्दी साहित्य की सजग-सह्रदय पाठिका के रूप मे हुआ था ! वह भी फोन पर हुए एक संक्षिप्त वार्तालाप पर सीमित था ! इसके बाद धीरे-धीरे मैंने उनके अन्य रूपों को जाना ! आज जब उनकी नवीनतम पुस्तक के बारे में कुछ लिखने का अवसर आया है तो यह उचित ही होगा कि मैंने जैसा उन्हें जाना है उसे पाठकों के सामने वैसा रख सकूँ !
     श्रीमती मेहेंदले, जैसा कि कुल नाम से पता चलता है, मराठी भाषी हैं ! लेकीन उनके बाल्यकाल का एक बडा हिस्सा बिहार में बीता है ! इस नाते वे सहज रूप से द्विभाषी है ! दो समृद्ध भाषाओं पर समान अधाकार का उन्होंने रचनात्मक तरीके से खूब उपयोग किया है ! एक तरफ लीना जी ने भाषाओं में समान अधिकार के साथ स्वतंत्र लेखन करती हैं ! मुझे इस बात की निजी तौर पर प्रसन्नता है कि उनके अनेक लेख, कहानियाँ और कविताओं को एक संपादक के रूप में मैं नियमित प्रकाशित करता रहा हूँ ! हिन्दी के अन्य अनेक पत्रों में भी उनकी रचनाएँ लगातार छप रही हैं
     श्रीमती लीना मेहेंदले का एक और परिचय है ! वे भरतीय प्रशासनिक सेवा की उच्चाधिकारी हैं ! आई..एस. की बहुविध जिम्मेदारियों व व्यस्तता के बीच भी उन्होंने रचनात्मक लेकन से अपना प्रगाढ संबंध बनाए रखा है ! यह मानना बिल्कुल भी गलत न होगा कि वे जगदीशचन्द्र माथुर, बालकृष्ण राव, विनोदचन्द्र पाण्डेय, सीताकांत महापात्र और अशोक वाजपेयी की परंपरा की लेखिका हैं ! यह जरूर है कि लीना जी स्वभाव से संकोची हैं और साहीत्य पर दावा जतलाने जैसा कोई काम उन्होंने नहीं किया है ! शायद इसीलिय अपने उपरोक्त पूर्ववर्तियों से हटकर सरकारी नौकरी में लेखक-सुलभ विभागों और पदों पर काम करने के बजाय वे अक्सर ऐसे दायित्वों को संभालती रहीं जिन्हें "कठोर" माना जाता रहा है !
     प्रस्तुत निबंध संग्रह लीना जी के एक ओर रूप से हमारा परिचय करता है ! इसका पहला ही अध्याय "मेरी प्रांतसाहबी" एक सुदीर्घ लेक है ! इसमे उन्होंने आई.ए.एस. अधिकारी के रूप में अपने प्रारंभिक कार्यकाल का रोचक ब्यौरा प्रस्तुत किया है !  ऐसे अनेक अधिकारी हैं जिन्होंने अंग्रेजी में आत्मकथाएँ लिखी हैं ! इसमें सबसे ज्यदा चर्चित पुस्तक "अ टेल टोल्ड बाई एन ईडियट" है जो मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहे आर.पी.नरोन्हा ने लिखी थी ! हिन्दी में ऐसे संस्मरणों का अभाव है ! मुझे तो सर्फ सुशीलचन्द्र वर्मा ही नाम याद आता है, जिन्होंने देशबन्धु के लिए "कलेक्टर की डायरी" शीर्षक से अत्यन्त रोचक शैली में अपने संस्मरण लिखे थे ! इस नाते कहा जा सकता है कि लीनाजी सुशीलचन्द्र वर्मा की परंपरा को आगे बढा रही हैं ! यहाँ यह कहना मुझे उचित लग रहा है कि भाषा के धनी हिन्दीभाषी अधिकारी अगर ऐसे वृतांत लिखें तो हिन्दी साहीत्य कुछ और समृद्ध हो जायगा !
     "मेरी प्रांतसाहबी"अध्याय किसी हद तक लेकीका के संवेदनशील मन का दर्पण है ! इसे आगे बढाते हुए उन्हें परवर्ती काल के अनुभवों को भी लिपिबद्ध करना चाहीए ! एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में वह एक बहुमुल्य दस्तावेज बन सकेगा ! इस संकलन मे लीनाजी ने प्रशासन से जुडे और बहुत से मुद्दों पर बेबाक विचार व्यक्त किए है ! यहां भी एक अधिकारी के रूप में उनका अनुभव और अवलोकन हमारे सामने आता है ! कन्या शिशु की हत्या, भ्रष्टाचार, सरकारी छुट्टीयाँ, पर्यावरण, परीक्षा पद्धती, महिला सशक्तिकरम जैसे जुदा-जुदा प्रश्नों पर लेखीका ने विचार किया है ! इनसे पता चलता है कि लेखिका ने नौकरी के लिए नौकरी नहीं की है, बल्कि एक सामाजिक उत्तरदायित्व को निभाने की कोशिश की है ! ये लेख समय - समय पर कुछ जाने-माने अखबारो में प्रकाशित हुए हैं ! जरूरत इस बात की है कि इन विचारों को प्रस्थान बिन्दु मानकर बात आगे बढाई जाए ! प्रशासनिक सुधार आयोग जैसी संस्थाओं को इन लेखों का नोटिस लेना चाहिए !
       इस संकलन में लीनाजी ने अपने प्रिय कवि कुसुमाग्रज पर एक लेख लिखा है ! वहीं हिन्दी, मराठी के कुछ अन्य साहित्यकारों के व्यक्ति चित्र उन्होंने प्रस्तूत किया है ! गीता के बुद्धियोग पर भी एक लेख इसमें है ! इस तरह प्रस्तुत संकलन किसी विषय विशेष पर केन्द्रित नहीं हैं ! अनेकानेक विषयों का समावेश होने से पाठक को यह लाभ मिलता है कि वह लेखिका की समग्र विचार सरणी से परिचित हो सकता है ! किन्तु इन निबंधों की सबसे बडी शक्ति इस तथ्य में निहित है कि लेखिका कहीं भी सामाजिक सरोकारों से विमुख नहीं होती ! एक रचनाकार समाज सक्रिय होना स्वाभाविक है ! एक अधिकारी से भी समाजोन्मुख होने की अपेक्षा की जाती है ! अपने इन दोनों रूपों के साथ चलते हुए लीनाजी ने मणिकांचन-योग प्रस्तुत किया है, ऐसा कहूँ तो गलत नहीं होगा !
      जीवन विवेक और अनुभवों से लमृद्ध इस निबंध संग्रह का हिन्दी जगत में स्वागत होगा ! यह विश्वास बनता है मैं लीनीजी को निरंतर रचनाशील बने रहने के लिए अपनी शुभकामनाएं देता हूँ !
                                                                         -ललित सुरजन

रायपुर                                                                          
२ जनवरी,२००९


******* मेरी प्रांतसाहबी अनुक्रम -- third collection of my articles

मेरी प्रांतसाहबी छप गया है




इस पुस्तकके निम्न लेख इस ब्लॉग पर हैं-- 1 (21 अंशोंमें), 2,3,4,5,8,10,11, 13, 17, 20, 21, 22 -- अन्य 9 दूसरे ब्लॉगोंपर
सामाजिक सरोकारों से संबंधित मेरे हिन्दी लेखोंका तीसरा संग्रह "मेरी प्रांतसाहबी" का लोकार्पण 14 सितम्बर हिन्दी दिवस के अवसर पर संपन्न हुआ।
पहले दो संग्रह थे जनता की राय और है कोई वकील लोकतंत्रका।
लोकार्पण कार्यक्रम का अतापता --
Monday, 14 th sep, evening 5.00
at
Hindustani Prachar Sabha,
Mahatma Gandhi Memorial Building,
7, Netaji Subhash Road, Mumbai.
In the Hindi Diwas Samaroh arranged by Maharashtra Rajya Hindi Sahitya Academy.

प्रकाशक -- संकेत प्रकाशन, 5 उपेन्द्रनाथ अश्क मार्ग, (पुराना खुसरो बाग रोड) इलाहाबाद फोन 09450632885
प्रस्तावना -- ललित सुरजन, रायपुर फोन 09827141800प्रकाशक संकेत                                                             
अनुक्रम
1. मेरी प्रांतसाहबी 1-21-- नया ज्ञानोदय दिल्ली, y
2. पेपर लीक का जबाब है  y
3. कौन करेगा ये वादा  y
4. व्यवस्था की एक और विफलता y
5. इस ढीली दण्ड प्रक्रिया को बदलिये y
6. हिन्दी भाषा और मैं
7. संगणक और हिन्दी -- जरूरत है मूलतत्व तक जाने की
8. गो. नी. दाण्डेकर  y
9. मथना -- एक सागर को
10. डॉ. राज बुद्धिराजा  y
11. भगवद्गीताप्रणीत बुद्धियोग -चित्रप्रत
12. तेलगी के दायरे में--जनसत्ता ११.१२.०३ 
13. इस चुनाव में मैं बेजुबान  y
14. विभिन्न राज्यों में महिला विरोधी अपराधों का विश्लेषण -- मासिक हिमप्रस्थ, सिमला में प्रकाशित
15. राजस्थान -- क्या है जनमने और पढने का हक  + शिशु-लिंग-अनुपात
16. महिला सशक्तीकरण की दिशा में
17. सुरीनामियोंकी चिन्ता  y
18. उन्मुक्त आनंद का फलसफा
19. बायोडीजल -- अपार संभावनाएँ
20. हाथ जनता की नाडी पर  y
21. अगस्त क्रांति भवन -- अर्थात् कथा 9 अगस्त की इमारत की y
22. मालूम ही नही कि सुभाष स्वतंत्रता सेनानी थे  y
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इससे पहले प्रकाशित दो संग्रह थे --
जनता की राय
है कोई वकील लोकतंत्र का

शनिवार, 24 मई 2008

मेरी प्रांतसाहबी --20-- My days as Assistant Collector

मेरी प्रांतसाहबी -- My days as Assistant Collector --20
उन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में बँक भी अत्यन्त कम थे। या तो स्टेट बँक या फिर जिला सहकारी बँक। कई तहसिल मुख्यालयों में भी बँक नहीं पहुँचे थे। सरकारी पैसों का सारा व्यवहार सब ट्रेझरी के मार्फत होता था जो तहसिलदार के नियंत्रण में कार्य करती। तहसिलदार हर महीने सबट्रेझरी का इन्स्पेक्शन करता और प्रांत अफसर वर्ष में एक बार। उस दिन सारी रकम गिनी जाती और सारे रजिस्टर्स जाँचे जाते। प्रांतसाहब के मुख्यालय तथा अन्य तहसिल कार्यालयों से पांच सात व्यक्तियों की डयूटी लगाकर एक टीम बनाई जाती जो दो दिनों में इस काम को अंजाम देती थी। इस इन्सपेक्शन के दौरान मैंने पहली बार कौतुहल भरी नजरों से देखा कि किस प्रकार नोटों की गड्डियाँ नजाकत से थामकर उन्हें फटाफट गिनते हैं। उन क्लर्कों के अंगुलियों की कोई भी जुम्बिश व्यर्थ नही होती थी। पहली बार यह नजारा देखकर मैं ठिठक गई थी- कि मैं भी यह तरीका सीखूँ। लेकिन वह ख्याल छोडकर मैं दूसरी बातों में लग गई तो वह बात पीछे छूट गई।
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ट्रेझरी इन्स्पेक्शन के दिन ही तहसिल के प्रत्येक गांव से पुलिस पाटील को बुलाकर उन्हे सम्मान चिह्न स्वरूप पान की गिलौरी प्रांतसाहब के हाथों दी जाती थी। थालियों में चांदी के बर्ख और लाँग से सजी पान की गिलौरियाँ रखी जाती थीं। तहसिलदार एक एक पुलिस पाटील को बुलाकर उनका परिचय करवाते। पुलिस पाटील प्रायः गांव का प्रतिष्ठित व्यक्ति होता था और उसकी नियुक्ति पूर्णतः प्रांत अधिकारी के मत से होती थी। गांव में कोई भी दुर्घटना या गुनाह होने पर उसकी सूचना पुलिस पाटील ही पुलिस में देता था। यह आवश्यक माना जाता कि वह व्यक्ति गांव में प्रतिष्ठित हो, साथ ही उसकी सूचनाएँ विश्वसनीय हों।

लेकिन आज पुलिस पाटील एक नौकरी बनकर रह गया है। सम्मान चिन्ह की गिलौरी देने की प्रथा और उसकी आत्मीयता समाप्त हो गई है। लेकिन एक नया पहलू भी उभर रहा है। चूँकि अब यह एक सरकारी नौकरी बन गई है, अतः इसमें अनुसूचित जातियों एवं महिलाओं के लिए भी आरक्षण का प्रावधान हो गया है। महाराष्ट्र की महिला पुलिस पाटील, महिला ग्राम पंचायत सदस्य या महिला सरपंच लेखन के लिए एक अच्छा विषय है जिस पर आज तक प्रथितयश साहित्यकारों की नजर नही पडी है। उन पर कोई कथा या उपन्यास नही लिखा गया है। प्रांतसाहबी के दौरान पुणे, खंडाला, पुणे-भोर आदि राष्ट्रीय महामार्गों पर यह बहुत खलता था कि कहीं कोई लेडिज टॉयलेट नही होते थे। कई वर्षों बाद इंग्लैंड गई तो देखा कि वहाँ महामार्गों की रचा का प्रोजेक्ट बनता है, उसी समय प्रोजेक्ट के एक अंश के रूप में तय होता है कि कहाँ कितने फर्स्ट एड सेंटर्स, कितने दवाखाने, कितने टॉयलेट्स, कितने स्नॅकबार, कितने टेलीफोन बूथ लगेंगे और जब तक वे न लग जाए, रास्ते के उस सेक्शन का निर्माण अधूरा माना जाता है। हमारे देश में पिछले दस वर्षों से नॅशनल हाइवे अथॉरिटी बनी है लेकिन आज भी उनकी कस्टमर सर्विस पॉलिसी नही बनी और न यह उनकी किसी पॉलिसी में लिखा गया कि ये सारी सुविधाएँ किसी भी रास्ते के प्रोजेक्ट का अभिन्न अंग होंगे।

यदि हमें महिला सक्षमीकरण की बात करनी है, तो महिलाओं में घुमक्कडी को प्रोत्साहन देना होगा, इसके लिये महामार्गों पर लेडिज टॉयलेट बनाना अनिवार्य होना चाहिये।
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मेरी प्रांतसाहबी --19-- My days as Assistant Collector

मेरी प्रांतसाहबी -- My days as Assistant Collector --19
मेरे पांचों तहसिलों में से सबसे निर्धन था वेल्हा तहसिल। वहाँ खाने रहने की सुविधाएँ शून्य थी। रेस्ट हाउस का खानसामा चाय बना देता था, वरना गाँव के बस स्टॅण्ड पर भी चाय बेचने वाला कोई नही था। वहाँ मुझे दिन का या रात का खाना लेना हो तो मैं मंगवाती थी केवल भाकरी- अर्थात जवार या बाजरे की मोटी रोटी, साथ में लहसन की चटनी और एक प्याज। सीजन हुआ तो एक ग्लास गन्ने का रस। वेल्हा के तहसिलदार भी रोज पुणे से आते जाते थे। लेकिन बाद में उनका तबादला हो गया और नए तहसिलदार आए कुलकर्णी जो परिवार समेत वेल्हा में ही रहने लगे। अब जब कभी मैं वहाँ जाती तो श्रीमती कुलकर्णी घर से ही मेरे लिये खाना भिजवाती- कभी खुद भी आकर बतियाने लगतीं। अक्सर से दुख जताती कि अब गांवों में कोई ब्राह्मण परिवार नही बस सकते। यह मेरे लिए नई बात थी। जहाँ मैं बडी हुई- उस बिहार में दसियों जातियाँ थी जो हर गांव में पाई जा सकती थीं। महाराष्ट्र के धरणगांव में मेरा जन्म हुआ था। वहाँ हम लोग हर गर्मी की छुट्टी में आया जाया करते थे और वहाँ ऐसी कोई समस्या नही थी। लेकिन मिसेज कुलकर्णी के बताने पर पहली बार मैंने ध्यान दिया कि वाकई पुणे जिले के गांवों में बाह्मण परिवार नही के बराबर थे। इसकी वजह थी सन्‌ अडतालीस की वह संध्या जब एक महाराष्ट्रीय ब्राह्मण गोडसे ने गांधीजी का वध किया था। पश्च्िाम महाराष्ट्र में बिहार के गांवों की तरह दसियों जातियाँ नहीं हैं- एक ही मराठा जाती के सत्तर अस्सी प्रतिशत लोग होते हैं और बाकी सारी जातियाँ मिलकर बीस तीस प्रतिशत। जैसी ही गांधीवध हुआ, अहिंसा का संदेश देने वाले गांधी जी के अनुयायी कांग्रेसियों ने गांव गांव में ब्राहमणों के घर जला डाले- संपत्ति लूट ली और उन्हें गांव से बाहर खदेड दिया। उस सकते से पश्चिम महाराष्ट्र का मानस आज भी उभर नही पाया है। इस जातीगत राजनीति से मैं आजतक अज्ञानवश अछूती और परे थी। आगे भी इससे परे रहना हो तो मुझे गहरे अध्ययन और चिन्तन की आवश्यकता होगी, यह मैंने ठान लिया।

जैसे वेल्हा तहसिलदार का था, वही हाल वडगाँव तहसील का। पुणे से वडगांव पहुँचने के लिए हर दो घंटे में लोकल ट्रेन है जो एक घंटे में वहाँ पहुँचा देती है। इसलिए मावल में नियुक्त हर कर्मचारी वडगांव की बजाए पुणे में ही रहता था। उन दिनों सबके पास फोन या मोबाइल भी नही होते थे। कानून व्यवस्था की दृष्टि से यह व्यवस्था कभी भी विस्फोटक बन सकती थी। पुलिस अधिकारियों का भी प्रायः यही हाल था। लेकिन दूसरी तरफ से देखा जाए तो वडगांव में महसुली, जिला परिषद या पुलिस कर्मचारियों के रहने के लिए न ही पर्याप्त घर थे न अच्छे स्कूल और अस्पतालों की सुविधा। यही हाल प्रायः हर तहसील में था। अच्छे प्रशासन के लिए ऐसे कई मुद्दों की चर्चा होना आवश्यक होता है। लेकिन चर्चा व सामंजस्य का अभाव आज भी है।
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मेरी प्रांतसाहबी --18-- My days as Assistant Collector

मेरी प्रांतसाहबी -- My days as Assistant Collector --18
इलेक्शन के दिन की एक घटना है। मैं पोलिंग बूथों पर घूम घूम कर मतदान कार्य को देख रही थी। देहू गांव के एक पोलिंग बूथ के बहुत करीब कांग्रेस और जनता दल दोनों के स्टॉल्स लगे थे और दो बार झटपें हो चुकी थीं। पटवारी ने दंगे की आशंका बताई।लेकिन वहाँ कुल पुलिस फोर्स थी तीन लाठीधारी कान्स्टेबल। मैं तुरंत वडगांव गई जहाँ तहसील कचहरी और साथ में पुलिस भी थी। इन्स्पेक्टर को पुलिस फोर्स लेकर देहू जाने को कहा तो वह हिचकिचाने लगा- कि फोर्स नही है। उसके थानेदार ने इधर उधर से लाकर किसी तरह पंद्रह कॉन्स्टेबुल एकत्रित किये तो कहने लगा- हमारे पास गाडी नही है। तब मैंने थानेदार और उसके पंद्रह जवानों को अपनी जीप में बिठाया और हम देहू पहुँचे। वहाँ दोनों बूथों में पत्थरबाजी और शराब की बोतलों से हमले शुरू हो चुके थे। ऐन वक्त पर हमारे थानेदार के आदमियों ने उन पर काबू किया और बडा दंगा होने से बच गया। थोडी देर बाद इलाके के एस डी पी ओ पाटील वहाँ पहुँचे और इन्स्पेक्टर को आडे हाथों लिया।

दो तीन दिन बाद कलेक्टर, मैं और एस पी इस घटना की विवेचना कर रहे थे। मेरा आग्रह था कि इन्स्पेक्टर पर कारवाई हो। एस पी ने अपने अफसर को बचाने की रौ में कहते गये- ऐसे मौके पर दंगे की जगह जाओ तो जान का खतरा होता है। आपको क्या गरज पडी थी कि अपनी जीप में डालकर पुलिस इन्स्पेक्टर को वहाँ ले जाती? पुलिस अधिकारी अपने आपको उस जगह से दूर ही रखना चाहता है और दंगा खतम होने के बाद वहाँ पहुँचने में ही बुद्धिमत्ता है। मैं अवाक्‌ देखती रही। कलेक्टर और एस पी बहुत सीनियर थे। मैं कुछ कह नही पाई। बाद में दो तीन ज्यूनियर पुलिस अफसरों ने मुझसे कहा- आपकी कारवाई बिलकुल ठीक थी। इस एक घटना ने हमारे मन में आपके प्रति आदर पैदा किया है। ये दो अलग अलग नमूने थे हमारे पुलिस प्रशासन के।

करीब एक वर्ष पूर्व मैं एक आदर्श नमूना देख चुकी थी जब में प्रोबेशनर थी। तब एस पी दूसरे थे। तब इमर्जेंसी चल रही थी। सभी विरोधी पक्ष एक ही जनता दल के बॅनर तले एकत्रित थे। जनता दल के किसी नेता ने पुणे में एक भाषण दिया था। मुंबई से दबाव बन रहा था कि भाषण में उल्लेखित भाषा के आधार पर उन्हे गिरफ्तार किया जाय और उन पर एन एस ए (नॅशनल सिक्यूरिटी ऍक्ट) लगाया जाय। सामान्यतः पुलिस किसी को कैद करती है तो चौबीस घंटे में उसे न्यायालय में पेश करना पुलिस के लिये अनिवार्य है। लेकिन एन एस ए में यह मियाद छह महीने की थी। इंटरप्रिटेशन का पूरा हक कलेक्टर को था लेकिन एक्ट में यह निर्देश था कि कलेक्टर अपनी विवेकबुद्धि का उसी प्रकार इस्तेमाल करे जैसे कोई सुयोग्य जज करता है। साथ ही कलेक्टर का निर्णय ही अंतिम था। उस निर्णय में सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की कोई दखल संभव नही थी।

उस एक दिन में दसियों बार कलेक्टर पर ऊपर से दबाव आता रहा । तीन बार कलेक्टर और एस पी चर्चा के लिये बैठे। प्रोबेशनर होने के नाते मुझे भी विशेष अनुमति थी वहाँ बैठने की। ब्रिटीश काल से ही कलेक्टर को हर महीने एक सिक्रेट कोड भरा लिफाफा भेजा जाता है। उस महीने में आने वाले गुप्त संदेश इस कोड में लिखित कुंजी की मदद से पढे जा सकते हैं। जरूरत न पडने पर कलेक्टर स्वयं हर महीने उस सील्ड लिफाफे को जला देता है। यह सब मैंने तब सीखा।

तीनों बार कलेक्टर और एस पी की बात लम्बी चली। उस वक्ता के भाषण का हर शब्द बार बार पढे गये। उन दिनों भाषण रिकार्ड करने की कोई सुविधा नही होती थी। किसी पुलिस की ही डयूटी लगती थी कि वह भाषण को जल्दी जल्दी लिखता रहे। भाषण मराठी में था- लिखने वाले की हैंडराइटिंग भी मराठी स्टाइल की थी जबकि कलेक्टर और एस पी दोनों तमिलियन। शायद यह भी एक वजह थी मेरी उपस्थिती की। फिर भी दोनों ने भाषण का हर वाक्य कई कई बार पढा, हर शब्द पर चर्चा की और हर बार इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि 'विवेकबुद्धि' से परखने पर वह भाषण एन एस ए लगाने के लिये पर्याप्त नही था। मेरे लिए यह घटना एक अच्छा पाठ था कि कैसे एक विवेकशील अधिकारी अपनी सच्चाई पर अडिग रह सकता है। उन दिनों शेषन्‌ या निर्वाचन आयोग आदि कुछ नही थे। कलेक्टर और एस पी दोनों को कभी भी ट्रान्सफर ऑर्डर आ सकता था। फिर भी दोनों दबाव में नही झुके।
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मेरी प्रांतसाहबी --17-- My days as Assistant Collector

मेरी प्रांतसाहबी -- My days as Assistant Collector --17
मैं प्रांतसाहेब थी तब पुणे के नजदीक ईगल फलास्क की फॅक्टरी में प्रिंस आगाखान की व्हिजिट तय हुई। प्रिस आगाखान खोजा जाति के सर्वोच्च धर्मगुरू हैं और उनकी व्हिजिट व्ही आय पी व्हिजिट थी। पारसी, बोहरी और खोजा ये तीनों जातियाँ हमारे देश की उन जातियों में से है जिनकी कार्यक्षमता और व्यावसायिक सच्चाई की मैं हमेशा कायल रही हूँ। खोजा, बोहरी या पारसी कम्यूनिटी की जनसंख्या अत्यल्प है और वे सारे प्रायः व्यापार करने वाले हैं लेकिन उनके व्यापार में एक गजब की सच्चाई और अदब है जिससे हम काफी कुछ सीख सकते हैं। ईगल फॅक्टरी में मैं पहले भी जा चुकी थी। लेकिन इस व्हिजिट के कारण मुझे खोजाओं के खानपान, रस्मोरिवाज आदि भी करीब से देखने को मिले। खासकर प्रिस के व्यक्तित्व ने मुझे काफी प्रभावित किया।

पुणे जिला पहाडियों और वादियों का जिला है। जिसमें जगह जगह पहाडों को काटकर रास्ते बनाये गये हैं। इन्हे घाट-रास्ता कहते हैं। एक दोपहर को मैं अपना कार्यालयीन काम कर रही थी कि खबर आई कि दिवा घाट के एक घाट रास्ते पर बस पहाड से नीची गिरी है। मैं तुरंत निकलकर वहाँ पहुँची। उपर से ही देखा जा सकता था कि बस के चक्के और कई हिस्से टूटकर अलग गिर चुके हैं। सभी प्रवासी थोडे अधिक जखमी हैं। फिर भी उन्हें अपने सामान की चिंता होना स्वाभाविक था। मदद के लिये अधिक लोग नही थे। चार आदमी एक स्ट्रेचर पर किसी को लिये ऊपर चढ रहे थे।

मैंने बचपन में गर्ल गाइड, होम गार्डस्‌ जैसी संस्थाओं में प्रशिक्षण पूरा किया था। मेरे अंदर का 'बालवीर' एकदम जाग पडा और मैं पहाडी पगडंडी से नीचे उतरने लगी। मेरे साथ के सिपाही, पटवारी और मंडल निरीक्षक को थोडी देर लगी समझने में। लेकिन फिर वे भी दौडकर अतरते हुए मेंरे पास आए। मंडल अधिकारी वयोवृद्ध थे मुझसे कहा- आप ऊपर आ जाइये। गांव से मदद आ रही है, इन तक पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है। लेकिन फिलहाल कलेक्टर साहब को सूचना पहुँचाना आवश्यक है जो आप ही कर सकती हैं। मैंने पल दो पल उसे देखा। इस आदमी ने अपने पचीस तीस वर्ष इसी काम में लगाए होंगे। यह सही कह रहा है। प्रांत अधिकारी का मुख्य काम यह नही है कि कूद पडो- बल्कि यह है कि उचित निर्देश दे-देकर सबसे काम करवाओ। मै उपर आई। कलेक्टर से वायरलेस पर बात की। उन दिनों मोबाइल या एस टी डी जैसी सुविधाएं नही थीं। कलेक्टर ने पूछा- कितने जखमी होंगे, कब तक पुणे पहुँचेंगे, सबको संचेती हॉस्पिटल भेजा जाए वहाँ मैं अभी डॉक्टर संचेती से बात करता हूँ, तुम शाम साडे छः बजे तक वापस आकर मुझसे मिलो इत्यादि। फिर रात को हम दोनों संचेती हॉस्पिटल गए मरीजों को देखने। जो पांच व्यक्ति मर चुके थे उनके कम्पन्सेशन के लिए नोट बनाकर शासन के पास भेजी। जहाँ रास्ते के खराब मोड के कारण बस दुर्घटना हुई थी उसे सुधारने का निर्देश सडक विभाग को भेजा, जब कहीं जाकर उस दिन की डयूटी पूरी हुई।
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