रविवार, 28 नवंबर 2010

3 कौन करेगा ये वादा ? रिंकू पाटील के लिये


3 कौन करेगा ये वादा ?
                                      -    लीना मेहेंदळे, भा.प्र.से.

     संगीता ऊर्फ रिंकू पाटील शिकार हुई - एक बर्बर समाजकी पाशविकता की, निष्क्रीयता की और कायरता कीलेकिन अफसोस, कि इसके साथ अभी भी हमारी आत्मसंतुष्टि और धन्यता नही मिट पाई हैकिसका खून खौल उठा इस घटना के दौरान ? या इसके बाद तुरंत ? या आज भी ? और हमने क्या किया ?
     समाचार पत्रोंने इस दर्दनाक और शर्मनाक घटना का विवरण तत्काल प्रकाशित किया और एक प्रश्नचिन्ह जनता के सामने खडा कर दिया, पर उसके बादशायद इस प्रश्नचिन्ह को कायम लोगोंकी निगाह में रखने का प्रयत्नविधानसभा में प्राय: हर सदस्यने इस अपराध पर गहरा क्षोभ प्रकट कियाउसके बाद ?   चर्चा की दिशा बदलकर यह अधिक महत्त्वपूर्ण बात बन गई कि इस प्रश्न पर स्थगन प्रस्ताव लाया जाना चाहिये या नही, सरकार गिरनी चाहिये या नही, मुख्यमंत्री या शिक्षामंत्री को पदत्याग करना चाहिये या नही कई नागरिकोंने पत्रलेखन या स्तंभलेखन द्बारा अपनी तीव्र प्रतिक्रिया दर्शाई - शायद मैं भी उसी समूह की मात्र एक और सदस्य बन जाऊँशिक्षकोने और मानसशास्त्रियों ने क्या कियाएक केस स्टडी, कि कैसे इन मौकोंपर लोग हतप्रभ और किंकर्तव्य विमूढ हो जाते हैउल्हासनगर की जनता ने क्या कियापुलिस का धिक्कार और तीन चार संदेहपूर्ण व्यक्तियों को पकडने में सहायता |

     पुलिस ने क्या कियाकभी मंथर गति और कभी तेज चाल दिखाईवह भी किसी प्रयोजनसे नहीजिससे जो बन पडा उसने उतना ही कियामसलन रेलवे पुलिससे मृतदेहकी पहचान जल्दी नही कराई जाती - सो नही कराई गईकोर्ट के सम्मुख केस जल्दी उपस्थित नही कराई जा सकती - सो नही कराई जायेगीक्रूरकर्मा अपराधियों के आरोप की सुनवाई जल्दी नही कराई जा सकती, उन्हें सजा जल्दी नही दी जा सकती - सो वह बातें भी जल्दी नही कराई जायेंगीपुलिस के कुछ अधिकारी भगोडे अपराधियोंको ढूॅढ निकालने में माहिर हैं, तो उन्हें जल्दी ढूँढा गयालेकिन उनके रिवाल्वर आये कहाँसेवे लायसेंस किसके नाम से थेकया वे रद्द कराये जायेंगेया उनसे प्रश्न पूछे जायेंगेया उनके विषयमें जनता को कुछ बताया जायगानही - क्यों कि पुलिस या प्रशासन के काम करनेका वह तरीका नही होता - इसलिये वैसा नही किया जायगा
इनके अलावा बाकि लोगोंने क्या कियाशायद कुछ चर्चा - बसएक हताशा की भावना, एक दीर्घ उच्छ्वास और एक भविष्यवाणी, कि यह बस अब ऐसे ही चलेगा |
     किंकर्तव्यविमूढता तो हमारे घर भी कुछ देर तक छाई रहीबच्चे दस और बारह वर्ष के हैंयदा कदा अखबार पढ लेते हैंकभी कुतूहलवश - जो कि कभी ही कभी होता है - और कभी खास लेख के लिये हमारे कहने परउन्हें क्या कहा जाय - कि आजका अखबार पढो और पहचान कर लो उस क्रूरतापूर्ण समाजसेया उन्हें अज्ञान के सुखमें रखा जाय, ताकि उनके दिमाग को एक गहरे, दुष्ट असर से बचाया जायेउन्हें पता लगने दें या नही, कि ऐसे बर्बर अपराध आज हो रहे है ?
     मैं जानना चाहती हूँ कि हमारे जैसे कितने माँ-बाप हैं जिन्होंने इस प्रश्न को झेला हैं और क्या तय कियाकितने माँ-बाप है जिन्होंने इस दुर्घटना से पहले कभी अपने बच्चोंसे समाज में पनपती गुंडागर्दी, और बर्बरता की चर्चा की हैसंगीता की हत्याके पहले क्या कभी हमने अपने आपको यह बताया है कि बर्बरता और अन्याय जहाँ भी दिखे, हमें उसे रोकनेके लिये तत्काल सामने आना हैक्या कभी अपने बच्चोंको यह बताया हैक्या उनके स्कूलमें जाकर कभी पूछा है कि उन्हें ऐसे मौके के लिये क्या सिखाया जाता है ?
     हमने आप भी यही सीखा और बच्चोंको भी यही सिखाया कि इस समाजमें मनमानी ही सबकुछ हैकुछ बेईमानी कर सकें, कुछ अकड दिखायें, कुछ लूट-खसोट करें, तभी हम टिक सकते हैं |   दूसरे भी जब ऐसे अनुचित कुकर्म करते हैं तो वह उचित है - इसलिये नही कि वह सही है बल्कि इसलिये कि उनके पास अधिक ताकत है, अधिक पैसा है, और यदि वे हमसे भी ज्यादा मनमानी या अत्याचार कर सकते हैं तो बेशक करें - केवल हमपर आँच नही आयेहम हर उपायसे उस आँचसे बच सकें |   जहाँ अपराध हो रहा है, - या तो हम उसमें शामिल होकर लूटका हिस्सेदार बनें |   या फिर हर प्रयत्नसे वहाँसे अलग हट जायें - उंगली तो क्या आँखे भी उठायें |   आँख उठाना तो क्या, एक विचार तक दिमाग में नही कौंधे कि कैसे उस अपराध को रोका जा सकता है |   यही हम आपभी सीख रहे हैं और बच्चोंको भी सिखा रहे हैं |
     और आज संगीता की हत्या के बाद क्या हम कुछ और करने को तैयार हैंजो बच्चे इस जघन्य अपराधके मूक और कायर साक्षी बने रहे, उनमेंसे किसके मनमें आक्रोश जागाकिसने अपने माँ-बाप से पूछा कि उनके इस व्यवहारके लिये कौन जिम्मेदार हैक्या किसी माँ बाप ने चाहा है कि काश उनका बच्चा कुछ  और करताया हर माँ-बाप ने भगवानको सराहा है कि उनका बच्चा इस शिकारकांड में सुरक्षित बच गया - चाहे अकर्मण्यतासे ही सही
     क्या मैंने खुद कभी अपने बच्चोंसे कहा है कि वे ऐसे अपराध का -- आगे आकर मुकाबला करेंक्या मैंने ऐसे मौकेपर मुकाबले के लिये उन्हें तैयार किया हैआज यदि मेरे बच्चोंके स्कूलमें यही बर्बरता घट रही हो तो मैं उनसे किस बर्ताव की अपेक्षा करूँगीऔर संगीता के माता पिता या खासकर उसकी बहन मेरे बच्चोंसे किस बर्ताव की आशा करेंगे ?
     क्या हम अभिभावक संगीताके बलिदान की वेदी पर यह वादा कर सकते हैं कि भविष्यकालीन ऐसी हर घटना मे हमारा बच्चा मूक साक्षी नही बना रहेगासंगीताके प्रति जो अपराध हुआ उसके गुनहगार और सजावार तो हम सभी है |   लेकिन यदि इस वादे को अपनाकर और पूरा कर हम अपना ऋण चुका सकें तभी हम भविष्यमें शिकार बननेसे बच सकते हैं |
     हम अभिभावक आगे आयें - यह मेरी अपील हैयही एक उपाय है इस अपराधको रोकनेका और प्रायश्चित्त काहम केवल अपने अपने घरोंमे, बल्कि इकठ्ठे आकर, समूहमें जुट कर अपने बच्चोंको तैयार कराने में लग जायेंकि उन्हें अन्याय और अपराध के सम्मुख भागना नही, लडना हैकि उन्हें अपनी सुख सुविधा जुटानेके लिये अन्याय का सहारा नही लेना है, तथा औरोंका भी रोकना है |
इस सामूहिक प्रक्रिया में हम क्यों हरीष के माँ-बाप को भी शामिल करेंवे अपने बेटे को तो खो ही चुके  हैंसाथ ही इस पाशविक, जघन्य अपराध का कलंक भी अपने सर पर लेकर उन्हें जीवन गुजारना है | समाजके  क्षोभ का आज उनके पास कोई उत्तर नही है | क्या वे संगीता का ऋण चुकाने की बात सोचेंगेक्या वे साहस जुटाकर कह पायेंगे कि उनके बेटेने जो कुछ किया उससे बचनेके लिये और उसका मुकाबला करनेके लिये वे अन्य बच्चोंको तैयार करेंगेऔर यदि उन्होने साहस जुटाया तो क्या समाज उन्हें एक मौका देगा ?
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शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

05 इस ढीली दंड प्रक्रिया को बदलिए

इस ढीली दंड प्रक्रिया को बदलिए
नभाटा दिल्ली, जनवरी 2000
नौ जनवरी, १९९९ की रात को भुवनेश्रवर-बारंग-कटक मार्ग पर श्रीमती अंजना मिश्र के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। इस धटना के दो चश्मदीद गवाह भी थे, जिनमें से एक अंजना के साथी सुतनु और दूसरा टैक्सी ड्राइवर राऊत थे। इन दोनो ने भी अपने बयान पुलिस को दिए जिनमे इस आरोप की पुष्टि की गई है। व्यक्तियों के नाम भी पुलिस ने जान लिये है और ११जनवरी, एक आरोपी साहू पकड़ा भी जा चुका है। साहू ने पुलिस के समक्ष अपराध स्वीकार भी कर लिया था और उस जगह की पहचान भी कर ली जहां बलात्कार किया गया था। इसी जगह की पहचान अंजना के दो गवाहों ने भी कर ली है। पुलिस को मेडिकल रिर्पोट भी मिल गई है। यह रिर्पोट प्राथमिक रिर्पोट है और बेहद अपर्याप्त रुप से को ----- करते है। अब सवाल यह है कि जब इस जघन्य रिर्पोट पुलिस में लिखी जा चुकी है और कम से कम एक अपराधी ने अपराध भी मान लिया है और गवाह तथा अन्य सबूत भी पुलिस के पास है। एक गंभीर सवाल यह उठता है कि भारत की शिक्षित व महिलाओं का क्या करते बनता है? हम समझ सकते है जब अंजना जैसी कोई धटना हो रही है या जब तक कोई भी अपराधी मौजूद है तब तक देश की कोई महिला इस तरह के खतरे से खाली नही है। क्या यह समझने की जिम्मेदारी भी हमारी नहीं कि जब तक बलात्कार करते वाले हर अपराधी को तत्काल और तत्परता से सजा नही दी जाती तब तक समाज मे ऐसे ही और अपराध अधिकाधिक होते रहेगे? और इस उलझन की जिम्मेदारी भी हमारी ही है कि अपराधी को दंड मिलने में जितनी देर हो रही है उतना ही हमारा खतरा बढ़ रहा है। मेरे विचार से बारंग आसपास के गाँवों की महिलाएं भी जानती और समझती होगी कि जब साहू और उसके अन्य दो साथी (जो बारंग के ही निवासी है) खुले रहेगे या जमानत पर रिहा होते रहेगे तब तक उन महिलाओं के लिए भी खतरा शुरु हो जाता है जैस अंजना मिश्रा के साथ हुआ।

इन सारी बातों का विचार किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि आज की ---- में साहू के सारे अपराधों की जांच या छानबीन करना उतना आवश्यक नही है जितना कि साहू के जो भी अपराध आज न्यायालय मे ---- जा सकते है, उन पर तत्काल कार्यवाई हो और कम से कम ऐसे अपराधों के लिए उसे तत्परता से सजा भी मिले। अंजना ने आरोप ---- घटना सामान्य बलात्कार को न होकर सामूहिक बलात्कार को --- पीछे भूतपूर्व एडवोकेट जनरल जैसे उच्चतम अधिकारियों का --- है ओर इस षडयत्रं मे उड़ीसा के मुख्यमंत्री भी शामिल है। उधर --- सरकार ने भी यह घोषणा कर दी है कि इस सम्पूर्ण अपराध को और इस आरोप की न्यायिक जांच की जाएगी। फिर भी मै यह दावे के साथ कहना चाहती हूं कि आज की तारीख मे हमारी प्राथमिकता सम्पूर्ण की नही होनी चाहिए। हमारी प्राथमिकता वहां होनी चाहिए जो हम और आप अभी तत्काल सुनवाई के लिए कोर्ट में दाखिल कर सकें, जो हम --- कर सके और जिनकी सजा दिलवा सकें। सजा का आरंभ होना आवश्यक है क्योंकि वही एक बात है जिसमें समाज एवं महिला वर्ग को कुछ आशा बंध सकती है कि आने वाले दिनों में अपराधी को खुलेआम अपराध का मौका नही मिला करेगा ।

एक बार उन आरोपो को देखें जो अंजना ने लगाए है। सबसे पहला आरोप यह है कि साहू एवं अन्य दो व्यक्तियों ने, जिनकी पहचान पुलिस को ------ उसके साथ चार से छह धंटे तक रिवाल्वर को नोक पर बलात्कार किया। उसका दूसरा आरोप यह है कि इस षडयन्त्र में उड़ीसा के भूतपूर्व एडवोकेट इन्द्रजीत राय एवं भूतपूर्व मुख्यमंत्री पटनायक का भी हाथ है। उसका तीसरा आरोप यह है कि इस पूरे मामले में उडीसा पुलिस का रवैया अत्यन्त अमवंदनशील है। एक अपरोध स्पष्ट है कि साहू और उसके साथी बिना लाइसेंस के रिवाल्वर लिये धूम रहे थे और यह रिवाल्वर भी उनके पास नाजायज तरीके से ही पहुंचा होगा। इसी रिवाल्वर से उन्होंने अंजना और सुतनु को जान से मारने की धमकी दी जिसके कारण अंजना के साथ बलात्कार संभव हुआ। इस प्रकार हम देखते है कि कम से कम तीन अपराध ऐसे है जो साहू ने कबूल कर लिये है और जो
अन्य गवाहों के साक्ष्य एवं पुष्टि के साथ कोर्ट मे खीचे जा सकते है। क. अंजना पर बलात्कार जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा ३७६(१) के अंतर्गत एक अपराध है। ख. बगैर लाइसेंस के रिवाल्वर रखना जो कि आर्म्म एक्ट को धारा २५ के अंतर्गत अपराध है। ग. अंजना और उसके साथियों को रिवाल्वर दिखाकर मारने की धमकी देना जो भारतीय दंड संहिता की धारा ५०६ के अंतर्गत अपराध है वह है सामूहिक बलात्कार का अपराध जो भारतीय दंड संहिता की धारा ३७६ (२) के अंतर्गत दंडनीय है और उससे भी बड़ा अपराध का मामला एक षडयत्रं का है।

सवाल यह उठता है कि साहू को पहले तीन अपराधों के अंतर्गत तत्परता से सजा क्यों नहीं हो रही है जबकि अपराध को इतने दिन गुजर चुके है। गौर करने की बात यह है कि हमारी अपराध प्रक्रिया संहिता
(क्रिमेनल प्रोसेजन कोड १९७३) कही भी यह नही कहता कि हम न्यायिक कार्यवाई करने एवं दंड दिलवाने मे देर करे। उलट अपराध प्रक्रिया संहिता तो यह कहता है कि हर अपराध की जांच और न्यायिक प्रक्रिया और दंड की कार्यवाइ छह महीने के अन्दर ही पूरी होनी चाहिए। फिर भी हमारे देश की यह आदत बन चुकी है कि हम हर जांच बड़ी सुस्त और शिथिल गति से करते है। यह सुस्त गति न केवल हमारी पुलिस जांच में देखी जाती है बल्कि हमारी सार्थक प्रक्रिया और सरकार के अन्य विभागों में भी सर्वव्याप्त है। अंजना के केस से तो इस देरी या सुस्ती का एक सरकारमान्य कारण यह भी कहा जा सकता है कि पुलिस और न्यायिक जांच के द्वारा सरकार षडयंत्र तक के सारे मामलो की समग्र जांच करवाना चाहती है और समग्रता के कारणों के पीछे उन अपराधों का दुलंक्षित किया जा सकता है जो उस समग्रता का एक अंश है - भले ही वे अपराध कबूल क्यों न कर लिये गए हो। यहां मुझे एक कहावत याद आती है कि 'आधी छोड़ पूरी को धावे आधी मिले न पूरी पावे'। समग्रता के पीछे पड़कर आशिक किन्तु सहजता से सिद्ध होने वाले अपराध को आगे न चलाने के चक्रव्यूह में उड़ीसा पुलिस उलझकर रह गई है। यद्यपि यह मानना पड़ेगा कि केस को सही विधानों के अंतर्गत रजिस्टर कराने मे और छानबीन का सिलसिला बनाने में उन्होंने काफी तत्परता से काम किया। क्या इस चक्रव्यूह को बरकरार रखकर हम सारे अपराध जगत को खुशी का संदेशा नहीं दे रहे है कि भाई तुम तो अपराध करते चलो और हम तुम्हारा तब तक कुछ नही बिगाड़ेगे जब तक हम तुम्हारे सारे अपराधों की समग्र जांच पूरी न कर पाएं। और कौन कह सकता है कि पूरी और समग्र जांच में कितनी देर लग सकती है।

इस देश में कानून का सम्मान करने वाले जितने भी नागरिक है और महिला चेतन के लिए काम करने वाली जितनी भी संसथायें है, उनके आगे आने का समय आ गया है क्या वाकई यह सही है कि साहू के पहले तीन अपराधों की आज और तत्काल सुनवाई आरंभ कर देने से क्योकर समग्र जांच की न्यायिक प्रक्रिया मे बाधा पड़ सकती है? समग्र जांच की आड़ में छिप सकने का फायदा हम साहू या उस जैसे अपराधों को क्यों दे जबकि उसके छोटे अपराधों की सजा तो उसे तत्परता से दी जा सकती है। यदि कोई बाधा भी हो तो हमें उस बाधा को दूर करके तत्काल दंड प्रक्रिया का रास्ता ढूंढना पड़ेगा। यदि हम ऐसा नही कर पाते तो हमारे अपने और हमारे समाज के अस्तित्व को ही इससे खतरा है - अपराधों को कोई खतरा नही।

यहां जलगांव सैक्स स्कैडल में उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय का उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत है। मुंबई उच्च न्यायालय ने यह कहा कि बलात्कार की शिकार महिलाओं ने सेशन जज के सम्मुख जो बयान दिया, वह उन्हें अपर्याप्त लगा और ठीक से प्रभावित नही कर पाया। अन्य कारणों के साथ इस कारण को भी बताते हुए उच्च न्यायालय ने सैक्स स्कैडल के आरोपी नफजल को बरी कर दिया हालांकि सेशन को आरोप को सही पाया था और उसे सात साल की सजा भी सुनाई थी। हम सोचे कि इस केस को महिलाओं का साक्ष्य प्रभावित क्यों नही कर सका और इस अपूर्णता में सुनवाई की देरी का कारण कितना महत्वपूर्ण जलगांव सैक्स स्कैडल की धटना १९९३-९४ के बीच हुई जबकि ये कोर्ट के सम्मुख पेश होने तक वर्ष
१९९५-९६ आ चुका था। जरा सोचो कि हम क्या चाहते है कि बलात्कार की शिकार कोई भी महिला अपने जख्मों को इतने लम्बें समय तक ढोती चले ताकि साक्ष्य देने के समय प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत कर सके?

यहां हमें यह नही भूलना चाहिए कि जलगाँव के केस की सुनवाई जितनी तत्परता से हुई, वह भी एक अपवाद है। फिर भी सुनवाई मे दो का समय व्यतीत हो गया। बलात्कार के कई केसों में तो सुनवाई के पाँच से इस साल तक लग जाते है। क्या यह उचित है कि हम बलात्कार शिकार महिलाओं से कहे कि वे अपने सारे दर्द और जख्मों को दो से ---साल तक ढोती फिरे ताकि साक्ष्य के समय कोर्ट को प्रभावित कर सकें इसके बजाए क्या यह उचित नहीं कि हम उसके लिए ऐसा वातावरण तैयार करे जिसमें वह अपने दुख दर्द और जख्मों को भूल पाएं और जिन्दगी फिर एक नई आशा के साथ शुरू कर सके? क्या यह उचित नही कि उन्हें अपनी नारकीय यातनाओं को जल्दी व्यक्त करने का मौका दें तो उन्हें अपनी वेदना और अपनी बदले की भावना को नपुंसकता केस सालोसाल न ढोना पड़े कि समाज और न्याय प्रक्रिया कब उन पर उदार हो और उन्हें अपना बयान देने का मौका मिले? क्या यह पूर्णतया स्वाभाविक नही कि दो से पाँच वर्षो के बाद जब किसी बलात्कार की शिकार महिला को साक्ष्य देने को कहा जाता है और पूरी घटना की वेदना को दुबारा जीने के लिए आग्रहपूर्वक कहा जाता है और उस प्रक्रिया में उसकी छीछालेदर करने कोई उपाय बाकी नहीं छोड़ा जाता है, तो उनके सामने केवल यही उद्येश्य होता है कि किसी तरह वह जल्दी से जल्दी अपने साक्ष्य को पूरा कर ले। अदालत के तनाव भरे वातावरण से दूर भागकर खूली हवा में सांस ले सके। ऐसी हालत में यदि उसके साक्ष्य यथायोग्य तरीके से प्रभावित न कर सके और अपराधी मुक्त हो जाए तो क्या अपराधी से खतरा केवल महिला को है या सारे समाज को है? जलगांव के उदाहरण के बाद समाज को यह विचार करना चाहिए।

दुबारा अंजना के केस पर आते हुए हम एक बात और समझ ले भारतीय अपराध प्रक्रिया महिला सी आर पी सी कहीं भी यह नही --- कि जब बलात्कार और सामूहिक बलात्कार जैसे दो अलग अलग अपराध किए जाते हो तो दोनों की सुनवाई इकट्ठी अंतराल के लिए दी जाए। संहिता तो यही कहती है दोनों अपराध अलग अलग अन्तराल मे भुगतने के लिए कहा जा सकता है। लेकिन हमारी न्यायिक प्रक्रिया में अपराधी को उदारता से देखने का एक रिवाज बन चुका है, जिसके कारण अपराधों के सारे अपराधों को सजा एक समय के अन्तराल में दिए जाने का रिवाज सा चल पड़ा। सौ, सवा वर्ष पहले जब पहली बार संहिता लिखी गई थी, तो उस जमाने का काम, छह महीने के अन्दर पूरे कर लिये जाते थे। तब शायद यह उचित था कि सारे अपराधों की जांच इकट्ठी की जाए और सुनवाई भी इकट्ठी हो तो कोर्ट का समय दो बार नष्ट न हो । पर अब तो ऐसी हालत नहीं है इसलिए आज हमें इस परिपाटी को बदलना होगा । आज की --- आवश्यकता यह है कि जो भी अपराध तत्परता से सिद्ध हो पाना संभव हो उसकी कानूनी प्रक्रिया हम तत्परता से शुरू कर दें ताकि समाज के लिये कोई उदाहरण तो प्रस्तुत हो कि हम भी बलात्कार के शिकार महिलाओं को तत्परता से न्याय दिला सकते हैं और समाज को भी तत्परता से अपराध के भय से मुक्त कर सकते हैं । न्यायिक प्रक्रिया आरभं करने को तत्पर मांग हम केवल अंजना के लिये नहीं मांगते, वरन्‌ हमारे समाज की इसी तत्परता में टिकी है। आइए, अपने गणतत्रं के पचासवें वर्ष में अपने आप को एक कार्य तत्पर दंड संहिता और अपराध प्रक्रिया संहिता उपहार दें।
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बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

04 व्यवस्था की एक और विफलता

व्यवस्था की एक और विफलता
- लीना मेहेंदळे, भा.प्र.से.

आज से पचास वर्ष पहले की बात है, तब देश के हर कोने से हर समझदार व्यक्ति स्वतंत्रता की लडाई मे अपना हाथ बँटा रहा था | ब्रिटीश सरकार देशवासियोंकी किसी दलील, किसी अपील को सुनने से इनकार कर रही थी | तब मुंबई में गावलिया, टैंक मैदान पर एक विशाल सभा का आयोजन हुआ | वहाँ नेताओं ने दो संदेश दिये, देशवासियों को संदेश दिया - "करो या मरो" और ब्रिटिश सरकार से कहा - "भारत छोडो" | सारा देश इन दो नारों से गूंज उठा | यह नारा किसी पार्टी का नहीं था बल्कि, उन सभी के दिलों की आवाज थी जो आजादी के दीवाने थे, मातृभूमि के लिये सिर पर कफन बांध कर चलते थे और जीवन से अपने लिये सत्ता, संपत्ति, यश, किर्ती, सम्मान या ऐसी किसी बात की मांग नहीं करते थे, वे दिन थे अगस्त 1942 के |

फिर भारत स्वतंत्र हुआ, उस घटना को पचास वर्ष पूरे हुए | यादगार स्वरूप फिर से मुंबई के उसी अगस्त क्रांति मैदान पर समारोह का आयोजन हुआ | देशवासियों को याद दिलाने के लिये कि वे दिन कैसे थे| संकट के, त्याग के, संकल्प पूर्ति के, वे देश के लिए मर मिटने की तमन्ना वाले लोगों के दिन थे | उन दिनों की और उन लोगों की याद दिलाने के लिये समारोह का आयोजन हुआ |

मुख्य समारोह 9 अगस्त को अगस्त क्रांति मैदान पर होना था, उसमे देश के प्रधानमंत्री आने वाले थे | उसके पहले 8 अगस्त को एक समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को श्रीमती मृणाल गोरे के साथ देखा गया | विषय था उन दैसी कई ज्येष्ठ स्वतंत्रता सेनानी महिलाओं का सम्मान व गौरव | इस समारोह के फोटो 9 अगस्त को कई अखबारों के पहले पन्ने पर छपे | लोगों ने उसे देखा, पुलिस वालों ने भी देखा ही होगा | उसी 9 अगस्त को प्रधानमंत्री का कार्यक्रम भी था | कार्यक्रम से पहले पुलिस ने कुछ महिलाओं पर लाठी चलाई जिसमें वही मृणाल गोरे भी थीं जिन्हें एक दिन पहले सरकार सम्मानित कर चुकी थी | महिलाओं का अपराध यही था कि वे एक मूक मोर्चा बनाकर अगस्त क्रांति मैदान में जाकर 1942 के शहीदों को मूक श्रध्दांजलि अर्पित करना चाहती थी, जो वे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हर वर्ष से करती आयी हैं |

वाह साहब, जिन क्रांतिकारियों की याद को उजागर करने प्रधानमंत्री आ रहे हों, उन्ही क्रांतिकारियों को श्रध्दांजलि देने के लिये जानेवालों पर लाठी चलाई गई| मोर्चे में प्रमिला जी दंडवते भी थीं जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ऐसे कई मोर्चो में भाग लिया होगा और विदेशी सरकार के सिपाहियों से लाठियाँ खाई होंगी | आज सबने उन्ही दिनों की याद में फिर अपने ही पुलिस ज्यादतियाँ सहीं | पुलिस की दृष्टि में उनका अपराध यही था कि वे ऐसी जगह जाना चाहती थीं और वर्षों से जा भी रही थीं, जहाँ प्रधानमंत्री आनेवाले थे और पुलिस के लिए प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था का प्रश्न सर्वोपरि था | श्रीमती मृणाल जी ने उन्हें समझाया कि प्रधानमंत्री का आगमन समय बहुत दूर है, उनकी मुख्यमंत्री से इस विषय पर बातचीत हो चुकी है और मुख्यमंत्री ने उन्हें मुख्य कार्यक्रम से पहले अपने मोर्चे के साथ जाकर श्रध्दांजलि अर्पित करने की पूर्वानुमति दे दी है | लेकिन नही साहब, नही| आखिर उन्हें लाठियाँ खानी ही पडीं |

पुलिस की दृष्टी से शायद यह व्यवहार सर्वथा समर्थनीय हो - शायद नहीं | यह जानकारी जनता के लिये बडी लाभप्रद सिध्द होगी कि पुलिस के महकमे से कौन इस व्यवहार को अशोभनीय मानता है और क्यों ? यद्दापि, पुलिस के किसी वरिष्ठ अधिकारी की प्रतिक्रिया अखबार में पढने को नही मिली, फिर भी, अनुमान है कि नब्बे प्रतिशत पुलिस इस घटना का समर्थन ही करेगी| आखिर क्यों? तो उत्तर मिलेगा कि साहब पुलिस ऑर्गेनाइजेशन एक ऐसा विभाग है जहाँ वरिष्ठ की आज्ञापालन ही सर्वोपरि माना जाता है | ऐसा न हो तो वहाँ तहलका मच जाये, फिर प्रधानमंत्री की सुरक्षा ऐसा मामला है जहां रिस्क नही लिया जा सकता, इत्यादि |

लेकिन मेरी निगाह में पुलिस का व्यवहार हमारी कमजोर पडती शासकीय व्यवस्था का ही प्रतीक है और उसी शासकीय अव्यवस्था से उत्पन्न भी है | अच्छा शासन कैसा हो ? इस संबंध में महाराष्ट्र के संत राजनीतिज्ञ और शिवाजी के गुरु माने जानेवाले कवि रामदास का एक दोहा है | "जब तुम देखो कि बडे से बडा जनसमुदाय बिना रुकावट के चल रहा है तो वह शासन व्यवस्था अच्छी है, जब जनसमुदाय जगह जगह अटक रहा हो, तो समझो वह शासन अच्छा नही है" -- जनांचा प्रवाहो चालला, म्हणिजे कार्यभाग जाहला, जन ठायी - ठायी तुंबला म्हणिजे खोटे !"
हम भी अपनी शासन व्यवस्था में जगह जगह रुकावटें निर्माण कर रहे हैं | हमारे लिए आज नियम और प्रोसीजर सर्वोपरि बन गया है न कि वह व्यक्ति जिसे उस नियम से परेशानी होनेवाली है | अब नियम कहता है कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम स्थल पर किसी को नहीं आने दिया जाये, तो यह नियम सब पर लागू हो गया, भले ही वह व्यक्ति ऐसा क्यों न हो जिसकी प्रशंसा वही प्रधानमंत्री या राज्य के मुख्यमंत्री कर रहे हों| दु:ख इस बात का है कि नियम में बद्ध इस शासन व्यवस्था में प्रमिलाजी जैसी स्वतंत्रता सेनानी पर यह शक किया जा सकता है कि उनके कारण प्रधानमंत्री को खतरा होगा | जब कि प्रधानमंत्री खुद एक स्वतंत्रता सैनिक रह चुके हैं और उन जैसे स्वतंत्रता सैनिकों की यादें उजागर कर उन्हें सम्मानित करने के लिए आ रहे हैं, तो नियम के साथ साथ यह औचित्य-भान हम कब सीखेंगे ?

आज सोचने की आवश्यकता है कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं| मुख्यमंत्री अवश्य ही मृणाल गोरे और अन्य सामान्य व्यक्ति के बीच का अंतर पहचानते है तभी मृणाल गोरे को घटनास्थल पर पहले जाकर श्रध्दांजलि अर्पित करने की अनुमति दी | फिर यह समझदारी कि मृणाल गोरे और अन्य व्यक्तियों में अंतर है, यह पुलिस के कनिष्ठ अधिकारियों या कांस्टेबलों के पास क्यों नहीं हैं ? उन्हे क्यों नही सिखाया जाता कि व्यक्ति - व्यक्ति में क्या और कैसे फर्क किया जाता है? पुलिस को केवल यही बताया गया था कि जो भी आदमी दिखे उसे रोको| चाहे, किसी तरीके से| यही कमजोरी शासन के अन्य हिस्सों में भी है | सामान्य जनों के प्रति आदर दिखाना, उनकी बात की तहमें जाने का प्रयास करना इत्यादि सद्गुण हैं जो सत्ता के वरिष्ठ अधिकारियों के पास भले ही हों लेकिन छोटे अधिकारियों और कर्मचारियोंके पास नही हैं | क्यों कि हाँ या ना कहने का अधिकार वरिष्ठ अधिकारी अपने पास रखना चाहते हैं | मृणाल गोरे के कार्य को पहचानकर उन्हें घटनास्थल पर जाने की अनुमति मुख्यमंत्री ने तो दे दी, लेकिन यही रवैया, यही डिस्क्रीशन यदि कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित कोई डी.सी.पी. दिखाये तो उसे सराहा नही जायेगा बल्कि, शायद डाँट ही पडेगी | क्योंकि शासन मे यह भी मान लिया गया है कि आपके निचले अफसर मे डिस्क्रीशन देने की योग्यता नही है न तो उनकी योग्यता बढाने का कोई प्रयत्न किया जाता है और न उन्हें कोई डिस्क्रीशन दिया जाना चाहिये | परिणाम यह होता है कि वे भी डिस्क्रीशन का रिस्क नहीं लेना चाहते| हालाँकि, डी.सी.पी. का पद एक बहुत वरिष्ठ पद है, फिर भी 9 अगस्त की घटना में किसी डी.सी.पी. से यदि पूर्वानुमति माँगी भी जाती तो वह नहीं देता | शायद सी.पी. या आई.जी. भी नहीं देते क्योंकि वे भी नहीं जानते कि उनके वरिष्ठ इसे किस निगाह से देखेंगे| हारकर मृणाल गोरे या किसी भी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री के पास ही जाना पडेगा |
इस घटना का एक पहलू और भी है | यदि मुख्यमंत्री ने पूर्वानुमति दे दी थी, तो यह बात नीचे तक क्यों नहीं पहुँची, क्यों कार्यक्रम स्थल की ड्यूटी पर तैनात पुलिस काँस्टेबल को इसकी सूचना नहीं थी ? फिर जब मृणाल जी ने उन्हें बताया तब पुलिस के पास ऐसे उपाय क्यों नहीं थे जिसके जरिये तत्काल ऊपर तक संपर्क कर इसके सच झूठ की पुष्टि की जा सके ? इसलिये की कनिष्ठ कर्मचारी ऐसी किसी जाँच को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते - वे तब तक आपको काई सुविधा नही देंगे जब तक आप स्वयं प्रयत्न कर वरिष्ठों के आदेश उनके पास नही पहुँचाते | वरिष्ठ खुद भी इसे अपनी जिम्मदारी नही मानते | शासन की एक तीसरी अव्यवस्था भी यहां उभरकर सामने आती है | मान लिया जाये कि मामला चूँकि प्रधानमंत्री की सुरक्षा का था इसलिए पुलिस ने मृणाल गोरे और प्रमिला दंडवते जैसी महिलाओं को भी रोकना उचित समझा | यह भी मान लिया जाये कि उत्सव की गडबडी के कारण न तो मुख्यमंत्री की अनुमति की सूचना काँस्टेबल तक पहुंच सकी और न क्रांति मैदान का कोई पुलिसकर्मी मृणाल जी के बताने पर भी पुष्टि नही करवा पाया या मुख्यमंत्री से संपर्क नहीं कर पाया | चलिए, उत्सव की गडबडी में ऐसी छोटी-मोटी घटनाएँ हो जाती हैं | लेकिन जिस तरीके से पुलिस उन महिलाओं से पेश आयी उसका क्या समर्थन हो सकता है ? कम से कम पुलिसकर्मी अच्छा व्यवहार तो दिखा सकते थे | लेकिन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाये तो यह भी असंभव है | जिसके पास लाठी है, शक्ति है, और लाठी चलाने का अधिकार है, उसे जबतक अच्छे बर्ताव का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता और अच्छे बर्ताव का डिस्क्रीशन नही दिया जाता तब तक वह अपने अधिकार का प्रदर्शन बुराई से ही करेगा |
मुख्यमंत्री ने घटनास्थल पर जाकर और महिलाओं से माफी माँग कर अपना बडप्पन ही दुबारा साबित कर दिया | लेकिन जब तक वे खुद फैसला करके यह कोशिश नहीं करते कि यही बडप्पन उनके निचले अधिकारियों में भी आये, तब तक ऐसी अशोभनीय घटनाएँ घटती ही रहेंगी |
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दै. हमारा महानगर में प्रकाशित, अगस्त 1997