शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

लोकशाही -- अनुवादित पुस्तक १.१ व १.२

अध्याय  एक
लोकशाहीतील मूळ संकल्पना आणि तत्त्वे
1.लोकशाही म्हणजे काय?
आपण समाजात राहतो. आयुष्यभर समाजातील वेगवेगळ्या घटक संस्थाचे सदस्य म्हणून वावरतो. आपले कुटुंब, आपला शेजार, एखादे मंडळ, कार्यालयीन संघटना, जाती, प्रांत, राष्ट्र इत्यादी संस्थाचे आपण सभासद असतो आणि संस्थेसाठी म्हणून कित्येक निर्णय घेतो-निदान मत मांडतो. संस्थाशी ऋणानुबंध ठेवतो. संस्थेचे ध्येय काय आहे, कोणत्या नियमांतर्गत ते गाठायचे आहे, कुणावर जबाबदारी टाकायची आहे, फायदे मिळवायचे आहेत ते कुणासाठी? अशासारख्या सामूहिक निर्णयांचे स्वरुप आणि आपण आपल्या वैयक्तिक प्रश्नांसाठी वैयक्तिक जबाबदारीवर घेतलेल्या निर्णयांचे स्वरुप वेगळे असते.
सामूहिक निर्णय जास्तीत जास्त योग्य आणि न्यायोचित असणे हे लोकशाहीचे खरे मर्म आहे, यासाठी निर्णय प्रक्रियेत भाग घेण्याचा सर्वांना समान हक्क असावा आणि तो त्यांना योग्य त-हेने बजावता यावा हे आदर्श लोकशाही व्यवस्थेचे लक्षण मानले जाते. सामूहिक निर्णय प्रक्रियेवर लोकमताचे नियंत्रण आणि सर्वांना समान हक्क हे लोकशाहीचे दोन निकष ठरतात. कोणत्याही लहान मोठया संस्थेत हे दोन निकष पाळले जात असतील तर ती लोकशाही मार्गाने जाणारी संस्था आहे असे आपण म्हणू शकतो.
लोकशाही संस्था आणि लोकशाही सरकार
वरील चर्चेतून दोन मुद्दे स्पष्ट होतात. लोकशाहीची प्रकिया फक्त सरकार चालवण्यापुरती मर्यादित नाही. कोणत्याही सामूहिक निर्णयासाठी लोकशाही तत्त्व वापरले जाऊ शकते. तरीही संस्थागत लोकशाही आणि राज्य या संस्थेतील लोकशाही यांच्यात मोठा फरक असा आहे की, राज्य किंवा सरकार ही संस्था अत्यंत व्यापक आहे. समाजातील प्रत्येक संस्थेवर आणि व्यक्तीवर सरकार या संस्थेची अधिसत्ता आहे. प्रत्येक माणसाकडून समाज व्यवस्थेसाठी कर गोळा करणे, तसेच, कैदेची वा मृत्यूची शिक्षा देणे हे दोन्ही अधिकार फक्त सरकारला आहेत. म्हणूनच, लोकशाही सरकार असण्याला कितीतरी पटींनी जास्त महत्व आहे. या कारणाने, या पुस्तकातील चर्चा प्रामुख्याने लोकशाही शासनाबाबत असेल.
लोकशाही ही सापेक्ष असते
दुसरा मुद्दा असा की, कोणत्याही संस्थेतील लोकशाही ही सापेक्ष असते-संस्था शंभर टक्के लोकशाही तत्त्वाने चालते किंवा ते तत्त्व अजिबात पाळत नाही अशी अवस्था कधीच नसते. लोकांचे नियंत्रण आणि मतप्रदर्शनाचा समान हक्क ही दोन मूलभूत तत्त्वे किती खोलवरपणे लोकांच्या मनात भिनलेली आहेत आणि वापरली जातात यावरुन लोकशाहीची प्रत ठरते. व्यवहारात ज्या देशांत लोकप्रतिनिधींना ठरावीक मुदतीनंतर एकदा लोकांना सामोरे जावे लागते, आणि निवडणूक जिंकून सत्तेवर यावे लागते, जिथे सर्व प्रौढ व्यक्तींना मतदानाचा तसेच निवडणूक लढवायचा हक्क आहे, आणि जिथे लोकांचे नागरी आणि राजकीय हक्क कायद्याने संमत झालेले आहेत त्या देशात लोकशाही आहे असे आपण म्हणतो.
पण अजून तरी कोणत्याही लोकशाही देशात लोकमताचा सुयोग्य वचक आणि समान राजकीय हक्क (म्हणजे मतदानाचा किंवा निवडणूक लढवायचा) हे दोन निकष निखळपणे लागू होतांना दिसत नाहीत. त्या अर्थाने कोणत्याही देशातील लोकशाही प्रक्रिया पूर्णत्वाला पोचली असे म्हणता येणार नाही. त्या त्या देशातील लोकशाहीचे समर्थक अजूनही हे दोन निकष पूर्णपणे गाठता यावेत म्हणून प्रयत्नशील आहेत आणि त्यांचा हा लढा अजून बराच काळ पुढे चालू राहणार आहे.
२.आपण लोकशाहीला इतके महत्त का द्यावे?
लोकशाहीचे महत्त्व का मानावे याची कित्येक कारणे आहेत.
मताचा समान हक्क
लोकशाहीचे पहिले ध्येय आहे-सर्व नागरिकांना सारखेपणाने, समान हक्काने वागवणे! फार पूर्वी लोकशाही विरुद्ध उमरावशाही(अरिस्टोक्रसी) या वादात अरिस्टोक्रसीचा मूळ सिद्धांत असा मांडला आहे की काही लोकांच्या जीवनाला इतरांच्या जीवनापेक्षा जास्त किंमत दिली पाहिजे, तसेच त्यांच्या मतालाही. कारण बहुतेक नागरिक अज्ञानी, अशिक्षित, अदूरदृष्टीचे आणि अपक्क विचारांचे असू शकतात. या उलट त्या काळातील साहित्यिक, विचारवंत, कायदेपंडित आणि लोकशाहीच्या इतर समर्थकांनी ठामपणे 'प्रत्येकाला किमान एक पण कोणालाच एकापेक्षा जास्त मत नाही', असे सूत्र मांडले. आधुनिक काळात हेच तत्त्व मान्य झाले आहे.
आता हे कबूल की, लोकांना माहिती मिळवायला आणि ती पचनी पडायला वेळ लागतो, पण वेळ आली की, ते जबाबदारीने वागू शकतात हे ही तेवढेच खरे आहे. म्हणूनच, जसे स्वतःच्या आयुष्यात निर्णय त्या व्यक्तीने स्वतःघ्यावा हे तत्त्व आपण मान्य करतो,
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गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

इक्कीसवीं सदी की औरत

इक्कीसवीं सदी की औरत


नई शताब्दी और सहस्त्राब्दी की दहलीज पर खडे हम कह सकते हैं कि बीसवीं सदी की नारी चेतना और इक्कीसवीं सदी की नारी चेतना में बहुत अन्तर होगा ! बीसवीं सदी में नारी के अधिकारों की बातें हो रही थीं और अगला पर्व सक्षमता का होगा ! इसकी दिशा कैसी होनी चाहिए और उसमें हम क्या योगदान दे सकते हैं, यह मनन का विषय है !
भारत के परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि बीसवीं सदी में नारी को कई अधिकार मिले ! उन्नीसवीं सदी में बंगाल से सती-प्रथा विदा हुई अर्थात् जीने का हक मिला ! लेकिन उसी समय भारत की आजाद साँसों को बचाने की अन्तिम लडाई में लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों से मात खानी पडी ! फिर हमारी अर्थव्यवस्था के छिन्न-भीन्न होने का दौर चला ! हमारे कारीगर, हमारा आयुर्वेद, हमारा व्यापार, सब धीरे-धीरे ब्रिटिश राज में सिकुड रहे थे, लेकिन इसके साथ ही सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली खुल रही थी ! इस नई शिक्षा प्रणाली का उपयोग प्राय: हर समाज-सुधारक ने किया और इस तरह बीसवीं सदी में स्त्री शिक्षा का दौर चला ! विधवा विवाहों को मान्यता मिली ! बाल विवाह रूके ! एक तरह से कहा जा सकता है कि नारी को दुख की जिन्दगी को सुख में बदलकर जीने का और शिक्षा पाकर अपने रास्ते आप ढूँढने का अधिकार मिल गया है !
बीसवीं सदी में भारत को नारी चेतना को दो अलग-अलग कालखण्डों के सन्दर्भ में देखा जाना चाहीए ! पहली अर्धशती गुलामी में और दूसरी स्वतंत्रता के माहौल में ! पहले कालखंण्ड की तीन महत्त्मपूर्ण बातें गिनाई जा सकती हैं ! बडे पैमाने पर महिलाओं की शिक्षा का कार्यक्रम चला ! फिर आर्यसमाज, ब्रह्मसमाज जैसी संस्थाओं के कारण सामाजिक कार्यक्रमों में महिलाओं की सहभागिता बढी ! स्वतन्त्रता की लढाई में भी महिलाएँ क्रान्तिकारी और सत्याग्रही दोनों तरह से शरीक हुईं ! लेखन क्षेत्र में भी उनका आगे आना आरम्भ हुआ ! इस दौर में हम पंडिता रमाबाई, दुर्गा भाभी, कस्तूरबा गाँधी, सरोजिनी नायडू जैसे नाम गिना सकते हैं ! स्वतंत्रता के बाद अगले पचास वर्षों में कई क्षेत्रों में महिलाएँ आगे आई ! प्रधानमन्त्री का पद सँभालने वाली इन्दिरा गाँधी से लेकर ऐसे कई क्षेत्र और कई नाम गिनाए जा सकते हैं जहाँ महिलाओं को व्यक्तिगत रूप से अभूतपूर्व सफलता और कर्त्तव्यपूर्ति का सन्तोष मिला है !
लेकिन इसके बावजूद यह सच है कि कई क्षेत्रों में अब भी नारी अनपहचानी है ! गणित, भौतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र जैसे गहन माने जाने वाले विषयों में औरतों की दखल को हिकारत से देखा जाता है ! युद्ध, यु्द्धशास्त्र, सेना आदि में स्त्रियाँ बहुत कम हैं ! रणनीति, रिजर्व बैंक, रॉ या आईबी जैसी गुप्तचर एजेंसियों, व्यापार और उद्योग के क्षेत्र, बैंकिंग और यहाँ तक कि शतरंज के खेल में भी औरत को कम दर्जे का माना जाता है ! एक समान सूत्र उन सारे क्षेत्रों में है जहाँ बीसवीं सदी की महिला अभी तक नहीं पहुँच पाई है, और वह यह कि जहाँ हर पल सतर्कता रखकर रणनीति और व्यूहरचना बदलकर दिमागी लडाई लडने की बात है, वहाँ नारी आब भी अबला समझी जा रही है ! केवल राजनीतिक नेतृत्व का क्षेत्र अपवाद है जहाँ पग-पग पर लडाई लडते हुए काफी हद तक यह साबित और स्वीकृत करा लिया कि नारी भी राजनीति के क्षेत्र में पुरूषों जितनी ही सक्षम है !

कुछ ऐसे प्रसंगों का उल्लेख करना उचित होगा जो स्त्री चेतना को आगे ले जाने की दिशा या रास्ता दिखाते हैं ! जब मेरी नौकरी की पहली पोस्टिंग पुणे में थी तो एक महिला से परिचय हुआ जो पुणे में १९४० के पहले से दुपहिया स्कूटर चलाया करती थी ! आज भी कई ऐसे बडे शहर हैं -- गाँवों की बात तो छोड ही दीजिएजहाँ कोई महिला स्कूटर चलाने लगे तो वह एक खबर बन जाती है ! लेकिन पुणे में स्कूटर चलाने वाली जनसंख्या में आज आधे से ज्यादा महिलाएँ निकल आएँगी ! एक और घटना तमिलनाडु की है ! वहाँ एक महिला कलेक्टर ने तय किया कि ऑफिस में काम करने वाली तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की सभी महिलाओँ को साइकिल दी जाएगी ! इसके बाद उन महिला कर्मचारियों का जो आत्मविश्वास बढा उससे सभी दंग रह गए !
इस लेखिका ने एक बार देवदासियों के आर्थिक पुनर्वास का एक कार्यक्रम आरम्भ किया ! वे काम तो सीख रही थीं, लेकिन बहुत अधिक उल्लास था ! फिर उनके लिए व्यक्तित्व विकास कार्यक्रम चलाने की योजना बनी ! कार्यक्रम का नियोजन करनेवाली एक शिक्षाविद् महिला थीं ! उन्होंने केवल चार कार्यक्रमों पर जोर दिया -- सामूहिक गीत गाना, मार्च पास्ट और झण्डे को सलामी देना, साइकिल चलाना और फोटोग्राफी ! इस कार्यक्रम का परिणाम जादुई रहा ! व्यक्तिमत्व विकास की ही एक मिसाल इला भट्ट की संस्था 'सेवा' है ! इसकी महिलाएँ कम पढी लिखी होने के बावजूद वीडियो फिल्में बनाना सीख चुकी हैं ! अपना विषय खुद चुनती हैं ! खुद बजट बनाती हैं, खुद स्क्रिप्ट लिखती हैं और शूटिंग करती हैं ! इसी तरह महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एक बार स्त्रियों को मिस्त्री बनने का प्रशिक्षण दिया गया तो उन्होंने माँग की -- हमें मजदूर नहीं मालिक बनना है ! फिर अगले छह महीने उन्हें सिखाया गया कि ग्राम पंचायतों के छोटे-छोटे कामों के ठेके पाने के लिए टेंडर कैसे भरे जाते हैं, खर्चे का और लगने वाले सामान का हिसाब कैसे किया जाता है, मजदूर कैसे लगाए जाते हैं, मजदूरी कैसे तय होती है, मजदूरों से कैसे काम करवाया जाता है और उनके काम का निरीक्षण कैसे किया जाता है ! ग्राम पंचायतों में महिला आरक्षण के बाद ऐसी घटनाएँ पढने-सुनने में आई कि कैसे महिला सरपंचों को भ्रष्टाचार के घोटाले में फँसाकर उन्हें अपमानित किया गया, पन्द्रह अगस्त पर उन्हें ध्वजारोहण का हक नहीं दिया गया, इत्यादि ! लेकिन दूसरी तरफ ऐसी भी घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ महिला सरपंचों ने अच्छे काम कर दिखाए, खासकर शिक्षा और जल आपूर्ति के क्षेत्र में !

महाराष्ट्र में इन्जीनियरिंग कॉलेजों की भरमार होने के कारण बाहरी इलाकों से कई लडके वहाँ दाखिला लेते हैं ! कॉलेजों में कई छात्राएँ होती हैं ! इस शहर में यातायात नियंत्रित करने वाली छात्राएँ या स्कूटर चलाने वाली महिलाएँ अक्सर दिखाती हैं ! उनके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं करता ! ऐसे ही बाहरी छात्रों के एक समूह से पूछा गया कि यदि तुम्हें वापस अपने शहर में जाकर स्कूटर चलाने वाली या ट्रैफिक कंट्रोल करने वाली महिलाएँ-छात्राएँ दिखें और दूसरे छात्र उन पर फिकरे कस रहे हों तो तुम्हारी प्रतिक्रिया क्या होगी ! इसका उत्तर था कि शायद वे भी उन फिकरे कसने वाले लडकों में शामिल हो जाएँगे ! अर्थात पुणे जैसे शहर को देखकर भी उनकी मानसिकता नहीं बदली ! इसके विपरीत एक युवती पुणे से मथुरा अकेली यात्रा कर रही थी ! वह पुणे की किसी कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर कम्पनी में काम करती है और मथुरा रिफाइनरी में नया सॉफ्टवेयर लगवाने जा रही है ! उम्र कोई बाईस-तेईस वर्ष थी ! यह पूछने पर कि ट्रेन तो रात में मथुरा पहुँचेगी, तुम अकेली लडकी कैसे मैनेज करोगी, उसका उत्तर था : कम्पनी गाडी भेजेगी, मेरे पास सबके फोन नम्बर इत्यादि हैं, मैनेज कर लेना कौन-सी बडी बात है? ----- अपूर्ण